अमर प्रेम कहानी बनी सांस्कृतिक विरासत : राष्ट्रपति भवन के स्वतंत्रता दिवस निमंत्रण में बस्तर की झिटकू-मिटकी लोकगाथा, राष्ट्रीय मंच पर मिली पहचान

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और लोक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली है। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक निमंत्रण में बस्तर की प्रसिद्ध झिटकू-मिटकी लोकगाथा के सांस्कृतिक प्रतीक को जगह दी गई है। बस्तर की लोककला, परंपराओं और जनजातीय विरासत से जुड़े इस प्रतीक का देश के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान के आधिकारिक निमंत्रण में शामिल होना छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय माना जा रहा है।
राष्ट्रपति भवन के निमंत्रण में बस्तर की सांस्कृतिक झलक
देश जब स्वतंत्रता दिवस के जश्न की तैयारियों में जुटा है, उसी बीच राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक निमंत्रण में बस्तर की संस्कृति की झलक देखने को मिली है। निमंत्रण में झिटकू-मिटकी लोकगाथा से जुड़े सांस्कृतिक प्रतीक को शामिल किया गया है। यह सिर्फ एक लोकगाथा का चित्रण नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी लोक परंपराओं, कला और जनजातीय जीवन की राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी को दर्शाता है। बस्तर की सांस्कृतिक विरासत अब स्थानीय पहचान से आगे बढ़कर देश के प्रतिष्ठित मंच पर अपनी जगह बना रही है।
सिर्फ जंगल और प्राकृतिक संपदा नहीं है बस्तर की पहचान
बस्तर की पहचान केवल घने जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक संपदा तक सीमित नहीं है। यहां की जनजातीय कला, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्य, धातु शिल्प और लोककथाएं इसकी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। इन्हीं लोक परंपराओं में झिटकू-मिटकी की गाथा का भी विशेष स्थान है। पीढ़ियों से यह लोकगाथा बस्तर के लोकजीवन में प्रेम, त्याग और संघर्ष की कहानी के तौर पर सुनाई जाती रही है।
अमर प्रेम कहानी बनी सांस्कृतिक विरासत
झिटकू-मिटकी को छत्तीसगढ़ की चर्चित प्रेम लोकगाथाओं में गिना जाता है। कहा जाता है कि झिटकू और मिटकी का प्रेम इतना गहरा था कि दोनों ने अपने प्यार की खातिर जान तक दे दी। यही वजह है कि समय के साथ उनकी कहानी बस्तर की लोकस्मृति में अमर प्रेम के प्रतीक के तौर पर स्थापित हो गई। छत्तीसगढ़ में जब भी सच्चे प्रेम की लोककथाओं की चर्चा होती है, झिटकू-मिटकी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, आज भी कई लोग इस प्रेमी जोड़े को श्रद्धा और आस्था के साथ याद करते हैं।
गपा देवी और खोड़िया राजा के रूप में होती है मान्यता
स्थानीय परंपराओं में मिटकी को गपा देवी, जबकि झिटकू को खोड़िया राजा के नाम से भी जाना जाता है। बस्तर में इन दोनों को प्रेम और दांपत्य जीवन से जुड़ी आस्था का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि कुंवारे और शादीशुदा जोड़े अपने रिश्ते में प्रेम और आपसी साथ बनाए रखने की कामना के साथ झिटकू-मिटकी का आशीर्वाद लेते हैं। यही वजह है कि यह लोकगाथा सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं रही, बल्कि स्थानीय सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं का हिस्सा बन गई है।
बेल मेटल कला में दिखाई देता है झिटकू-मिटकी का प्रेम
बस्तर की प्रसिद्ध धातु कला में भी झिटकू-मिटकी की कहानी की झलक देखने को मिलती है। पारंपरिक कलाकार बेल मेटल यानी ढोकरा कला के जरिए झिटकू-मिटकी की आकर्षक मूर्तियां तैयार करते हैं। इन मूर्तियों को लोग बस्तर की कला और अमर प्रेम की निशानी के तौर पर अपने घरों में स्थापित करते हैं। बस्तर की पारंपरिक धातु कला की पहचान देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक बनी हुई है और यहां आने वाले पर्यटक इन कलाकृतियों को अपने साथ ले जाते हैं।
झिटकू-मिटकी की याद में लगते हैं मेले
झिटकू-मिटकी की लोकगाथा आज भी बस्तर के लोकजीवन में जीवंत है। उनकी स्मृति से जुड़े आयोजन और मेले-मंडई स्थानीय परंपराओं का हिस्सा हैं। लोकमान्यताओं में उन्हें राजा-रानी के समान सम्मान दिए जाने की बात भी कही जाती है। समय के साथ झिटकू-मिटकी की कहानी ने लोकगाथा से आगे बढ़कर कला, आस्था और सांस्कृतिक पहचान का रूप ले लिया है।
राष्ट्रपति भवन के निमंत्रण में मिली जगह क्यों खास?
राष्ट्रपति भवन के स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक निमंत्रण में झिटकू-मिटकी के सांस्कृतिक प्रतीक को जगह मिलना बस्तर की लोक परंपराओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह पहल बस्तर की पारंपरिक कला, लोककथाओं और जनजातीय विरासत को देश के व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य में सामने लाने का माध्यम बनी है। स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व के आधिकारिक निमंत्रण में बस्तर की लोकगाथा का प्रतिनिधित्व होना छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता को भी रेखांकित करता है।
राष्ट्रीय मंच पर बस्तर की लोक विरासत
बस्तर की झिटकू-मिटकी लोकगाथा अब देश के सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक परिसर के स्वतंत्रता दिवस निमंत्रण का हिस्सा बनी है। इस लोकगाथा के जरिए बस्तर की कला, संस्कृति और परंपराओं को राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली है। झिटकू-मिटकी के बहाने बस्तर की लोक संस्कृति को मिली यह पहचान निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ की जनजातीय विरासत और पारंपरिक कलाकारों के लिए गौरव का विषय है।

नीलम अहिरवार
17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।
