पंडवानी गाने की वजह से टूटी शादी : पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी: पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई नहीं रहीं, लेकिन उनकी आवाज़ सदियों तक गूंजती रहेगी

रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली महान पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रायपुर के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं और उनका उपचार एम्स में चल रहा था। फेफड़ों में पानी भर जाने के कारण उन्हें सांस लेने में लगातार परेशानी हो रही थी। 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने 70 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भारतीय लोककला का एक स्वर्णिम अध्याय भी इतिहास का हिस्सा बन गया।
उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , राष्ट्रपति और प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने श्रद्धांजलि अर्पित की है साथ ही उनके निधन लिखा तीजन बाई जी का निधन छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जताया दुख
सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति!
मिट्टी से उठी वह आवाज़, जिसने दुनिया को पंडवानी से परिचित कराया
तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ की पारधी अनुसूचित जनजाति में हुआ। उनके पिता हुकुमचंद परधा और माता सुखवाती बाई थे। बचपन में वे अपने नाना ब्रजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनती थीं। उन्हीं कथाओं ने उनके भीतर पंडवानी के बीज बो दिए। महज नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने चचेरे नाना ब्रजलाल पारधी से पंडवानी सीखना शुरू किया और बाद में उमेद सिंह देशमुख से इस लोककला का प्रशिक्षण लिया।

जब 13 साल की बच्ची ने तोड़ी सदियों पुरानी परंपरा
महज 13 वर्ष की उम्र में चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उस दौर में महिलाएं केवल बैठकर वेदमती शैली में पंडवानी गाती थीं, जबकि खड़े होकर अभिनय के साथ पंडवानी प्रस्तुत करना पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था।
लेकिन तीजन बाई ने परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने कापालिक शैली अपनाई, जिसमें कलाकार मंच पर खड़े होकर अभिनय, संवाद और दमदार आवाज़ के साथ महाभारत की कथा सुनाता है।
यही निर्णय उन्हें इतिहास में अमर कर गया।

विरोध, बहिष्कार और टूटी शादियां... लेकिन नहीं टूटा हौसला
उनका संघर्ष किसी महाकाव्य से कम नहीं था।
परिवार और समाज ने उनके पंडवानी गाने का विरोध किया। सामाजिक बहिष्कार किया गया। उन्हें घर से निकाल दिया गया। पहली शादी टूट गई। दूसरी शादी में भी उनकी कला ही विवाद का कारण बनी।
एक प्रस्तुति के दौरान उनके पति मंच पर पहुंचे और अभद्र व्यवहार करने लगे। उस समय तीजन बाई ने तंबूरा उठाकर दृढ़ स्वर में कहा—
"तुमने केवल मेरा नहीं, मेरी कला और इस मंच का भी अपमान किया है। आज से तुम मेरे कोई नहीं हो।"
यह केवल एक महिला का प्रतिरोध नहीं था, बल्कि लोककला और आत्मसम्मान की रक्षा का ऐतिहासिक क्षण था।
इंदिरा गांधी भी हुई थीं प्रभावित
भारत भवन, भोपाल में प्रस्तुति के दौरान प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने प्रस्तुति का अवसर दिलाया।
कार्यक्रम के बाद इंदिरा गांधी ने कहा—
"आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं।"
इस पर तीजन बाई ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—
"महाभारत नहीं करती हूं, महाभारत की कथा सुनाती हूं।"
यह जवाब उनकी विनम्रता और कला के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गया।
हबीब तनवीर से श्याम बेनेगल तक
हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को देशभर में पहचान दिलाई।
इसके बाद प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल ने उन्हें अपने चर्चित धारावाहिक 'भारत एक खोज' में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया। इस धारावाहिक ने उनकी कला को घर-घर तक पहुंचा दिया।
1986 में भिलाई स्टील प्लांट ने उनकी प्रतिभा का सम्मान करते हुए उन्हें नौकरी भी दी।
आखिर क्या है पंडवानी?
पंडवानी छत्तीसगढ़ की अत्यंत लोकप्रिय लोकगायन परंपरा है, जिसमें महाभारत की कथा गीत, अभिनय और संवाद के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है।
मुख्य कलाकार तंबूरा हाथ में लेकर अलग-अलग पात्रों का अभिनय करता है। उसके साथ पांच से छह कलाकारों की मंडली होती है, जो हारमोनियम, तबला, मंजीरा, बैंजो और खंजेड़ी जैसे वाद्ययंत्रों से संगत करती है।
पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां हैं—
वेदमती शैली – बैठकर, शास्त्रीय ढंग से कथा वाचन।
कापालिक शैली – खड़े होकर अभिनय, संवाद और नाटकीय प्रस्तुति।
तीजन बाई कापालिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली पहली महिला बनीं।
दुनिया तक पहुंचाया छत्तीसगढ़ का लोकसंगीत
तीजन बाई ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि एशिया, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दुनिया के अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
उनकी आवाज़, अभिनय और कथा-वाचन ने भाषा की सीमाएं भी पार कर दीं।
सम्मान और उपलब्धियां
लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया—
1988 – पद्मश्री
1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2003 – पद्मभूषण
2003 – बिलासपुर विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट्.
2006 – पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट्.
2018 – फुकुओका पुरस्कार (जापान)
2019 – पद्म विभूषण
वे छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार थीं जिन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
एक युग का अंत
डॉ. तीजन बाई ने केवल महाभारत की कथा नहीं सुनाई, बल्कि अपने जीवन से संघर्ष, साहस, आत्मसम्मान और कला के प्रति समर्पण की ऐसी कहानी लिखी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा किसी जाति, लिंग या सामाजिक बंधन की मोहताज नहीं होती।
आज उनकी आवाज़ भले ही शांत हो गई हो, लेकिन पंडवानी का हर स्वर, हर तंबूरा और महाभारत का हर प्रसंग सदियों तक तीजन बाई के नाम के साथ गूंजता रहेगा।
लोककला की यह अमर साधिका अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत भारतीय संस्कृति की धरोहर बनकर हमेशा जीवित रहेगी।
नीलम अहिरवार
17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।
