48 साल बाद भी सरहद की रखवाली! : मौत के बाद भी नहीं छोड़ी ड्यूटी! बाबा हरभजन सिंह की अनोखी कहानी, आज भी चीनी सैनिक खाते हैं महान सैनिक से खौफ !

मेरी सिक्किम यात्रा से विशेष...
Baba Harbhajan Singh Mystery सिक्किम। देश की रक्षा के लिए सैनिक अपनी जान तक न्योछावर कर देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी ऐसे जवान की कहानी सुनी है, जिसे शहादत के दशकों बाद भी सेना की परंपराओं में सम्मान मिलता रहा? यह कहानी है सिपाही हरभजन सिंह की, जिनके बारे में प्रचलित मान्यताओं ने उन्हें 'बाबा' का दर्जा दिया। कहा जाता है कि शहादत के बाद भी उनकी उपस्थिति सीमा पर महसूस की जाती रही। यही वजह रही कि वर्षों तक उनकी स्मृति को विशेष सम्मान दिया गया और वे देश के सबसे चर्चित सैनिकों में शामिल हो गए। मात्र 22 साल की उम्र में ग्लेशियर से गिरने के कारण उनकी जान चली गई थी। बर्फ में दफन हो जाने के बाद भी लगभग 38 साल तक सेना ने उन्हें रिटायर नहीं किया। 38 साल के बाद साल 2006 में उन्हें सेना से अधिकारिक तौर पर रिटायर किया गया। इस दरम्यान उनको प्रमोशन भी दिया गया। जानिए उनकी पूरी कहानी.
कौन थे हरभजन सिंह?
हरभजन सिंह भारतीय सेना के जवान थे। 30 अगस्त 1946 को जन्मे बाबा हरभजन सिंह, 9 फरवरी 1966 को भारतीय सेना के पंजाब रेजिमेंट में सिपाही के तौर पर भर्ती हुए थे। 1968 में उन्हें 23वें पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम में भेजा गया।
कैसे हुई मौत?
4 अक्टूबर 1968 की बात है जब हरभजन खच्चरों का एक काफिला अपने साथ ले जा रहे थें। अचानक नाथू ला पास के नज़दीक आकर उनका पांव फिसल गया और घाटी में गिरने से उनकी मृत्यु हो गई। पानी का तेज बहाव उनके शरीर को बहाकर 2 किलोमीटर दूर ले गया। कहा जाता है कि उन्होंने अपने साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी मौत की ख़बर दी और यह भी बताया कि उनका शरीर कहाँ मिलेगा। खोजबीन करने पर तीन दिन बाद भारतीय सेना को बाबा हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर उसी जगह मिल गया।
15 हजार फीट पर मंदिर
गंगटोक से आगे जेलेप ला और नाथुला दर्रे के बीच करीब 15,000 फीट की ऊंचाई पर बाबा हरभजन सिंह का मंदिर स्थित है।यह भी माना जाता है कि सपने में उन्होंने इस बात की इच्छा जताई थी कि उनकी समाधि बनाई जाये। और उनकी इस इच्छा का मान रखते हुए उनकी एक समाधि बनवाई गई। लोगों में इस जगह को लेकर बहुत आस्था थी लिहाजा श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने 1982 में उनकी समाधि को 9 किलोमीटर नीचे बनवाया दिया, यहां उनकी तस्वीर, वर्दी और निजी सामान आज भी श्रद्धा से रखा गया है।
नाथुला प्लाइंट की विशेषता
नाथूला दर्रा हिमालय में स्थित एक महत्वपूर्ण पहाड़ी दर्रा है, जो सिक्किम को तिब्बत (चीन) से जोड़ता है। यह समुद्र तल से करीब 14,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस दर्रे को बंद कर दिया गया था, लेकिन 5 जुलाई 2006 को इसे दोनों देशों के बीच सीमित व्यापार के लिए फिर से खोल दिया गया। कभी भारत और तिब्बत के बीच होने वाले अधिकांश व्यापार का रास्ता यही था। नाथूला दर्रा प्राचीन रेशम मार्ग (सिल्क रूट) का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है
क्या है मान्यता?
स्थानीय लोगों और कई सैनिकों का विश्वास है कि बाबा हरभजन सिंह की आत्मा आज भी सीमा की रक्षा करती है और समय-समय पर सैनिकों को संभावित खतरे से आगाह करती है। जिसे अब बाबा हरभजन मंदिर के नाम से जाना जाता है। हर साल हजारों लोग यहां दर्शन करने आते है। यह एक लोक-मान्यता है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
चीन से जुड़ी चर्चित कहानी
एक लोकप्रिय कथा के अनुसार, सीमा पर तैनात कुछ चीनी सैनिकों ने भी बाबा को घोड़े पर गश्त करते हुए देखने का दावा किया था। कुछ सैनिकों ने बताया कि अग यहां ड्यूटी के वक्त सो जाए तो बाबा हरभजन सिंह थप्पड़ मारकर जगा देते हैं सालों से इस पहाड़ी इलाके में कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई.
हालांकि, इस दावे का कोई आधिकारिक या स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक बाबा हरभजन सिंह मंदिर पहुंचते हैं। यह स्थान आस्था, सेना के सम्मान और स्थानीय लोकविश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
आस्था और इतिहास
बाबा हरभजन सिंह की कहानी भारतीय सेना के एक जवान की स्मृति और स्थानीय आस्था से जुड़ी है।
यह कथा लोगों के विश्वास का हिस्सा है, जबकि ऐतिहासिक रूप से उनकी शहादत और सेवा का सम्मान किया जाता है।
नीलम अहिरवार
17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।
