देवास : पटाखा फैक्ट्री में लगी आग के बाद एक्शन में मोहन सरकार, जानिए कब-कब MP के बड़े हादसों ने सिस्टम पर उठाए सवाल !

शांति का टापू कहलाने वाला मध्यप्रदेश…क्या अब अफसरों की लापरवाही से हादसों का प्रदेश बनता जा रहा है? हरदा…पेटलावद…मुरैना…महू…छतरपुर…बरगी…इंदौर…छिंदवाड़ा और अब देवास…एक हादसे की जांच पूरी भी नहीं होती कि दूसरा विस्फोट, दूसरी मौतें और फिर वही सिस्टम की नींद.अगर हरदा हादसे से सबक लिया गया होता.तो क्या देवास की पटाखा फैक्ट्री में 14 मई का धमाका टल सकता था? मार्च में चेतावनी…मई में लाइसेंस…और फिर मौत का धमाका.आखिर क्यों मध्यप्रदेश में हादसे रुक नहीं रहे.और क्यों हर बार जिम्मेदारी तय होने से पहले फाइलें बंद हो जाती हैं.
14 मई… सुबह करीब 11 बजकर 30 मिनट… देवास जिले के टोंककला स्थित पटाखा फैक्ट्री में ऐसा विस्फोट हुआ… जिसने पूरे इलाके को दहला दिया…धमाका इतना भयानक था कि आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई दी… शवों के टुकड़े 20 से 25 फीट दूर तक जा गिरे…अब तक 5 मजदूरों की मौत… 15 से ज्यादा घायल… कई जिंदगी भर के लिए झुलस गए…
सिस्टम पहले सोया… फिर जागा
स्थानीय शिकायतें थीं…14 मार्च को इसी फैक्ट्री में आग लग चुकी थी…सरपंच ने शिकायत की…पटवारी रिपोर्ट में घनी आबादी और पेट्रोल पंप के पास होने का खतरा बताया गया…फिर भी कार्रवाई नहीं…उल्टा मई में लाइसेंस रिन्यू…सवाल— आखिर किसके संरक्षण में मौत की फैक्ट्री चलती रही?
नियमों की खुली धज्जियां
मुख्यमंत्री मोहन यादव अस्पताल पहुंचे…घायलों से मुलाकात की…NSA के तहत कार्रवाई की घोषणा हुई…जांच के आदेश भी दिए गए…लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही—हादसे के बाद कार्रवाई क्यों? हादसे से पहले रोकथाम क्यों नहीं.
MP के बड़े हादसे, जो सिस्टम पर सवाल हैं!
पेटलावद 2015
12 सितंबर 2015… झाबुआ का पेटलावद…
79 मौतें… सैकड़ों घायल…
मध्यप्रदेश का सबसे भयावह विस्फोट…
लाशें पोटलियों में समेटी गईं…
6 हरदा 2024
6 फरवरी 2024… हरदा पटाखा फैक्ट्री…
13 मौतें… 300 से ज्यादा घायल…
पूरा इलाका युद्धक्षेत्र बना…
मुरैना, महू, छतरपुर
एक के बाद एक धमाके…
हर बार कार्रवाई के दावे…
लेकिन हादसे जारी…
हादसों की तारीख
2015- पेटलावद
2022- मुरैना
2024- हरदा
2024- महू
2024- छतरपुर
2026- देवास
सिर्फ पटाखा नहीं… पूरा सिस्टम फेल
बरगी डैम क्रूज हादसा… 13 मौतें…
इंदौर भागीरथपुरा दूषित पानी… 35 मौतें…
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड… 20 से ज्यादा मासूमों की मौत…
यानी खतरा सिर्फ फैक्ट्रियों में नहीं…
जहां सिस्टम सोया… वहां मौत जागी…
सबसे बड़ा सवाल
क्या हर हादसे के बाद सिर्फ मुआवजा… निलंबन… और जांच ही समाधान है?
क्या बड़े अधिकारियों की जवाबदेही कभी तय होगी?
क्या लाइसेंस देने वालों पर हत्या जैसा केस चलेगा?
या फिर अगली त्रासदी तक सब कुछ सामान्य मान लिया जाएगा?
नीलम अहिरवार
17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।
