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सवाल जो कोई नहीं पूछता : 99% अंक लेकर भी नौकरी नहीं… आखिर हमारी मेरिट किस काम की ?

admin

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Sep 11, 2026
08:16 AM
99% अंक लेकर भी नौकरी नहीं… आखिर हमारी मेरिट किस काम की ?

- UMEESH GUPTA

हमारे यहां बच्चे को बचपन से एक ही बात सिखाई जाती है कि पढ़ो, अच्छे अंक लाओ, प्रतियोगिता पास करो और अपने भविष्य को सुरक्षित करो।

माता-पिता अपनी आय का बड़ा हिस्सा उसकी शिक्षा पर खर्च करते हैं। युवा वर्षों तक किताबों के बीच अपना जीवन रोक देता है। वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में दोस्तों से दूर होता है, सामाजिक जीवन से दूर होता है और अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों को सिर्फ एक सरकारी नौकरी की उम्मीद में खपा देता है। फिर एक दिन परिणाम आता है। वह 99 प्रतिशत अंक लेकर खड़ा है। लेकिन नियुक्ति पत्र उसके हाथ में नहीं है।

सवाल है - फिर उससे और क्या चाहिए?

भोपाल में पिछले दिनों शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों का आंदोलन इसी असहज सवाल को सामने लेकर सड़क पर आया। नीलम पार्क में शिक्षक अभ्यर्थी कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे थे। कुछ अभ्यर्थियों ने भूख हड़ताल तक की और 05 सितंबर को प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांग सरकार तक पहुंचाई।

इन अभ्यर्थियों का दावा है कि मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में शिक्षक पद रिक्त हैं, जबकि मौजूदा भर्ती में उससे बहुत कम पदों पर नियुक्तियां हो रही हैं। दूसरी ओर सरकार का पक्ष है कि रिक्त पदों और भर्ती योग्य पदों की गणना अलग-अलग परिस्थितियों और नियमों के आधार पर होती है।

यहीं से वह सवाल पैदा होता है, जो सिर्फ मध्य प्रदेश का नहीं, पूरे देश का है कि हमने युवाओं के लिए प्रतियोगिता तो बना दी, लेकिन रोजगार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं बनाई?

परीक्षा पास करना लक्ष्य था या सिर्फ एक और परीक्षा की शुरुआत?

भारत में सरकारी नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं है। यह सामाजिक सुरक्षा है, परिवार की आर्थिक स्थिरता है और छोटे शहर या गांव के युवा के लिए सामाजिक बदलाव का सबसे विश्वसनीय रास्ता है। इसीलिए एक पद के लिए हजारों आवेदन आते हैं। लेकिन हमारी भर्ती व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि युवा से कहा जाता है- प्रतियोगिता करो... मेरिट में आओ... दस्तावेज तैयार रखो... और अंत में कहा जाता है_पद नहीं हैं।

यहीं पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा होता है। अगर पद ही नहीं हैं तो परीक्षा इतनी बड़ी क्यों? और अगर पद खाली हैं तो भर्ती इतनी छोटी क्यों?

99 प्रतिशत की विडंबना

भोपाल के आंदोलन में सामने आए कुछ अभ्यर्थियों के अंक इस पूरे विवाद को गंभीर बनाते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, 99 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले उम्मीदवार भी नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।

कल्पना कीजिए, एक युवा ने परीक्षा प्रणाली की हर कसौटी पार कर ली, लेकिन व्यवस्था के पास उसके लिए सीट नहीं है। तब प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “उसे नौकरी क्यों नहीं मिली?” प्रश्न यह होना चाहिए_ “जिस योग्यता की हमने परीक्षा ली, उस योग्यता का उपयोग करने की हमारी नीति कहां है?”

लाखों शिक्षित, प्रशिक्षित और परीक्षा में सफल युवा किसी भी देश का सबसे बड़ा संसाधन होते हैं। लेकिन यदि यही युवा वर्षों तक प्रतीक्षा सूची और अगली परीक्षा की तारीखों के बीच भटकता रहे, तो यह केवल बेरोजगारी नहीं, मानव संसाधन की बर्बादी है।

खाली स्कूल, संविदा की बैसाखी और खाली हाथ युवा

इस समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू हमारी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से जुड़ा है। एक तरफ स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। दूसरी तरफ योग्य युवा सड़क पर हैं। और तीसरी तरफ सरकारें स्थायी भर्तियों की जगह अतिथि विद्वानों (Guest Teachers) या संविदा व्यवस्था से काम चलाने की नीति अपना रही हैं।

अस्थायी व्यवस्था से सरकारों का अल्पकालिक वित्तीय बजट तो बच सकता है, लेकिन यह दोहरी मार मारता है,

योग्य युवा को नौकरी की सुरक्षा और सम्मान नहीं मिलता।

स्कूल के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और निरंतर शिक्षा नहीं मिलती।

शिक्षक की कमी से दर्जनों बच्चों की बुनियादी समझ कमजोर होती है, जिससे गरीब परिवारों को मजबूरी में निजी स्कूलों का रुख करना पड़ता है। इसलिए शिक्षक भर्ती का सवाल केवल “नौकरी देने” का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य का सवाल है।

बेरोजगारी का आंकड़ा और 'कौशल बेमेल'

सरकारी आंकड़ों (PLFS 2025) के अनुसार, 15–29 आयु वर्ग में युवाओं की बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत थी और शहरी युवाओं में 13.6 प्रतिशत। इन आंकड़ों से इतर एक और बड़ा संकट है कौशल का बेमेल (Skill Mismatch) और गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का अभाव।

एक इंजीनियर अगर अस्थायी काम कर रहा हो, एक स्नातकोत्तर युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा के चक्रव्यूह में फंसा हो, तो उसे केवल "रोजगार में" मान लेने से समस्या खत्म नहीं होती।

प्रश्न यह भी है कि क्या हमारा निजी क्षेत्र (Private Sector) और औद्योगिक ढांचा इतना मजबूत हो पा रहा है कि वह इन योग्य युवाओं को सरकारी क्षेत्र से बाहर भी सम्मानजनक विकल्प दे सके? अगर निजी क्षेत्र में सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन का अभाव है, तो युवाओं का पूरा दबाव सरकारी नौकरियों पर ही पड़ेगा।

परीक्षा की तारीख से नियुक्ति पत्र तक...

...कितने साल?

एक सरकारी भर्ती की यात्रा देखिए_ विज्ञापन, आवेदन, परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन, काउंसलिंग, स्टे, याचिकाएं, संशोधित परिणाम और फिर अगली तारीख।

इस प्रक्रिया में युवा की उम्र निकल जाती है, परिवार की बचत समाप्त हो जाती है और उसका आत्मविश्वास टूट जाता है। किसी भर्ती व्यवस्था की सफलता का मापदंड सिर्फ "परीक्षा आयोजित करा देना" नहीं हो सकता। सफल भर्ती वही है जो समयबद्ध और पारदर्शी हो।

पारदर्शी ढांचा और नीतिगत सुधार की आवश्यकता

बेशक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियुक्तियां नियमों, आरक्षण और बजट के आधार पर ही होनी चाहिए। लेकिन युवाओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वास्तव में कितने पद भरे जाने हैं। व्यवस्था को सुधारने के लिए अब चार ठोस कदम उठाने का समय आ गया है_

  • वार्षिक भर्ती कैलेंडर (Recruitment Calendar)_ UPSC की तर्ज पर हर राज्य के भर्ती बोर्डों का एक निश्चित वार्षिक कैलेंडर हो, जिसकी समय-सीमा का पालन कानूनी रूप से अनिवार्य हो।

  • पारदर्शी मैनपावर ऑडिट (Manpower Audit)_ किस विभाग में कितने पद खाली हैं, कितने भरे जाने हैं और कितने समय में भरे जाएंगे, यह आंकड़ा सार्वजनिक डोमेन में हो।

  • अस्थायी संस्कृति पर विराम_ संविदा और अतिथि व्यवस्था को स्थायी भर्ती का विकल्प बनाना बंद किया जाए।

  • परीक्षा-केंद्रित से रोजगार-केंद्रित व्यवस्था_ पहले पदों की वास्तविक और पारदर्शी गणना हो, उसके बाद ही उतनी ही सीटों के लिए आवेदन और परीक्षा आयोजित की जाए।

युवा से सिर्फ धैर्य मत मांगिए

हम अपने युवाओं से अक्सर कहते हैं_“धैर्य रखो, अगली परीक्षा की तैयारी करो।”

लेकिन जिस युवा ने पांच साल पढ़ाई की, मेरिट सूची में स्थान बनाया और फिर भी सड़क पर खड़ा है, उससे केवल धैर्य की उम्मीद करना अन्याय है। लोकतांत्रिक दायरे में अपनी मांगों को उठाना युवाओं का अधिकार है, और सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे उनकी बात सुनें और पारदर्शी व्यवस्था का भरोसा दें।

असली सवाल

सवाल यह नहीं है कि युवा आक्रोशित क्यों हैं। सवाल इससे कहीं बड़ा है। हमने युवाओं को मेरिट का सपना दिखाया, लेकिन क्या हमने उस मेरिट का सम्मान करने के लिए नीतियां बनाईं?

हमने कहा_पढ़ो, उन्होंने पढ़ा।

हमने कहा_प्रतियोगिता करो, उन्होंने की।

हमने कहा_ मेरिट में आओ, वे आए।

अब अगर व्यवस्था कहती है “पद नहीं हैं”, तो सवाल पूरे समाज और नीति-निर्माताओं से है_ फिर हमने उन्हें इतने वर्षों तक किस उम्मीद में पढ़ाया?

और सबसे बड़ा सवाल यह है कि -

99 प्रतिशत अंक लेकर भी अगर एक युवा नौकरी के लिए सड़क पर खड़ा है, तो असफल वह युवा है… या हमारी व्यवस्था?

यही वह सवाल है, जो कोई नहीं पूछता।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं


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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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