मशहूर शायर बशीर बद्र नहीं रहे : पढ़िए मशहूर शायर की यादगार ग़ज़लें, जिन्होंने मोहब्बत और ज़िंदगी को अल्फ़ाज़ दिए

उर्दू शायरी की दुनिया के मशहूर नाम बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ था। उनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर था, लेकिन अदबी दुनिया उन्हें बशीर बद्र के नाम से जानती रही। करीब पांच दशकों से अधिक समय तक उन्होंने अपनी ग़ज़लों और शेरों के जरिए लोगों के दिलों में खास जगह बनाई। बशीर बद्र को उर्दू शायरी का वह चेहरा माना जाता है जिसने आम बोलचाल की भाषा में गहरी भावनाओं को पिरोकर ग़ज़लों को घर-घर तक पहुंचाया। साहित्य और नाटक के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें साल 1999 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था। उन्होंने भारत समेत दुनिया के कई देशों में मुशायरों में शिरकत कर अपनी शायरी का जादू बिखेरा। भोपाल में उनके निधन की खबर ने साहित्य जगत को गमगीन कर दिया है।
बशीर बद्र की चर्चित ग़ज़लें और शेर
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक 'उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है उस के आशियाने में
दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है उस को भूल जाने में

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया
काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया।
महलों में हम ने कितने सितारे सजा दिए
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया
तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना!
आईना बात करने पे मजबूर हो गया।
दादी से कहना उस की कहानी सुनाइए
जो बादशाह इश्क़ में मज़दूर हो गया।
सुब्ह-ए-विसाल पूछ रही है अजब सवाल
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया।
कुछ फल ज़रूर आएँगे रोटी के पेड़ में
जिस दिन मिरा मुतालबा मंज़ूर हो गया।

उर्दू अदब में बशीर बद्र की शायरी हमेशा जिंदा रहेगी। उनकी ग़ज़लें मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और जिंदगी के एहसासों को ऐसी सादगी से बयान करती हैं, जो हर दौर के लोगों को अपनी लगती हैं।
आलोक त्रिपाठी
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