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नाबालिग के गर्भपात पर सुप्रीम कोर्ट सख्त : कहा- पढ़ने की उम्र में मां बनाने पर तुले,एम्स का क्यूरेटिव पिटीशन खारिज

नीरज द्विवेदी

नीरज द्विवेदी

Apr 30, 2026
07:30 AM
कहा- पढ़ने की उम्र में मां बनाने पर तुले,एम्स का क्यूरेटिव पिटीशन खारिज

देश । देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) द्वारा दायर क्यूरेटिव पिटीशन को खारिज कर दिया। यह याचिका 24 अप्रैल के उस फैसले को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी, जिसमें अदालत ने 15 वर्षीय बलात्कार पीड़िता को 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पीड़िता की इच्छा सर्वोपरि है। अदालत ने एम्स की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को निर्देश दिया कि वे नाबालिग के माता-पिता से संवाद स्थापित करें और अंतिम निर्णय पीड़िता पर ही छोड़ा जाए कि वह गर्भावस्था जारी रखना चाहती है या नहीं।

एम्स के डॉक्टरों ने अदालत में दलील दी कि गर्भावस्था 30 सप्ताह पार कर चुकी है, ऐसे में भ्रूण जीवनक्षम (viable) स्थिति में है। उनका कहना था कि इस चरण पर गर्भपात करना चिकित्सकीय रूप से अत्यंत जटिल और जोखिमपूर्ण हो सकता है। डॉक्टरों ने आशंका जताई कि बच्चे के जन्म के समय गंभीर बीमारियाँ, अंगों की विफलता (ऑर्गन फेलियर) जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। साथ ही, नाबालिग पीड़िता के स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, यहाँ तक कि भविष्य में उसकी मातृत्व क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।

कोर्ट की संवेदनशील टिप्पणी

अदालत ने एम्स के तर्कों पर गंभीरता से विचार करते हुए कहा कि यह मामला अत्यंत पीड़ादायक है। पीठ ने उल्लेख किया कि पीड़िता एक रेप सर्वाइवर है, और यदि उसे अनिच्छा से गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया गया, तो यह उसके लिए आजीवन मानसिक आघात (ट्रॉमा) का कारण बन सकता है।

अदालत ने सख्त शब्दों में कहा कि किसी भी नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध माँ बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि बलात्कार से जुड़े मामलों में गर्भावस्था को जारी रखने या समाप्त करने का अंतिम अधिकार पीड़िता का ही होना चाहिए।

मीडिया और सरकार के लिए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को भी संवेदनशीलता बरतने की सलाह दी और कहा कि इस तरह के मामलों की रिपोर्टिंग करते समय पीड़िता की निजता और गरिमा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुनवाई के हर विवरण को सार्वजनिक करना उचित नहीं है।

इसके अलावा, केंद्र सरकार को सुझाव दिया गया कि वह वर्तमान कानूनों में संशोधन पर विचार करे, ताकि बलात्कार पीड़िताओं को 20 सप्ताह की समय-सीमा के बाद भी सुरक्षित और कानूनी रूप से गर्भसमापन की अनुमति मिल सके।

साथ ही, अदालत ने यह भी जोर दिया कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और सुनवाई को यथासंभव एक सप्ताह के भीतर पूरा करने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

नीरज द्विवेदी
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नीरज द्विवेदी

5 साल से ज्यादा का पत्रकारिता अनुभव। टीवी और प्रिंट मीडिया में कलमकारी की है। पॉलिटिकल और पब्लिक कनेक्ट की खबरों में दिलचल्पी। TV27NEWS DIGITAL में एंकरिंग भी कर रहे हैं।

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