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समय का सच : बच्चों को सोशल मीडिया से बचाना है या सोशल मीडिया कंपनियों से?

admin

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Aug 10, 2026
04:29 PM
बच्चों को सोशल मीडिया से बचाना है या सोशल मीडिया कंपनियों से?

-UMEESH GUPTA

अमेरिका में उठते सवाल, भारत की चिंता और एक ऐसी डिजिटल अर्थव्यवस्था, जहां बच्चों का ध्यान भी मूल्यवान संसाधन बन चुका है , कभी फेसबुक और इंस्टाग्राम को दुनिया से जोड़ने का माध्यम कहा गया था..

फिर वे संवाद के माध्यम बने...फिर मनोरंजन के..फिर कारोबार के। लेकिन अब दुनिया के सामने एक असहज सवाल खड़ा है कि क्या बच्चों का ध्यान, उनका समय और उनका मानसिक स्वास्थ्य भी डिजिटल कारोबार का हिस्सा बन चुका है ?

यह सवाल अब केवल भारत में नहीं उठ रहा। जिस अमेरिका ने दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों को जन्म दिया, वहीं समाज का एक बड़ा हिस्सा अब सोशल मीडिया कंपनियों से अधिक जवाबदेही मांग रहा है। Reuters/Ipsos के ताजा सर्वे में 61 प्रतिशत अमेरिकियों ने सोशल मीडिया कंपनियों पर अधिक सरकारी निगरानी का समर्थन किया और 66 प्रतिशत लोग 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए age-verification व्यवस्था के पक्ष में हैं। वहीं 52 प्रतिशत अमेरिकियों ने माना कि वे स्वयं सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिताते हैं।

यानी सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि सोशल मीडिया कितना लोकप्रिय है, सवाल यह है कि "लोकप्रियता और जिम्मेदारी के बीच सीमा कहां तय होगी?"

सवाल सिर्फ एक कंपनी का नहीं है, Facebook और Instagram की parent company Meta आज इस बहस के केंद्र में है। लेकिन इसे केवल Meta की कहानी मान लेना समस्या को छोटा कर देना होगा। आज बच्चे जिस डिजिटल दुनिया में बड़े हो रहे हैं, वहां स्मार्टफोन है, recommendation algorithm है, endless content है और लगातार आने वाले notifications हैं। हर अगला वीडियो पिछले से अधिक आकर्षक हो सकता है। हर notification वापसी का निमंत्रण हो सकता है। हर interaction platform के लिए engagement हो सकता है और engagement अंततः आर्थिक मूल्य में बदल सकता है। "यहीं से वह मूल प्रश्न पैदा होता है कि

"क्या बच्चे की भलाई और प्लेटफॉर्म का अधिक-से-अधिक engagement हासिल करना हमेशा एक ही दिशा में चलते हैं?" अगर नहीं, तो प्राथमिकता किसकी होनी चाहिए?

अब अदालतें भी सवाल पूछ रही हैं, अमेरिका में यह बहस अब केवल जनमत तक सीमित नहीं रही। 6 अगस्त को न्यू मैक्सिको की एक अदालत ने Meta को किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बनाए गए राज्य कोष में 567 million डॉलर देने और युवाओं की सुरक्षा के लिए Facebook तथा Instagram में कई बदलाव करने का आदेश दिया। यह आदेश उस मामले में आया जिसमें Meta के platform design और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर निष्कर्ष सामने आए। Meta ने आरोपों से असहमति जताई है और फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है। इससे पहले मार्च में इसी मामले में jury ने Meta को 375 million डॉलर के award के लिए उत्तरदायी ठहराया था। दोनों रकम को जोड़ें तो न्यू मैक्सिको मामले में आर्थिक दंड 942 million डॉलर तक पहुंचता है।

नए आदेश में मजबूत age verification, नाबालिगों के उपयोग पर सीमा, रात और स्कूल के समय push notifications पर नियंत्रण तथा parental safeguards जैसे उपाय शामिल हैं। हालांकि अदालत ने कुछ प्रस्तावित तकनीकी बदलावों, जैसे algorithm में व्यापक परिवर्तन और infinite scroll को बंद करने, को व्यवहारिक रूप से स्वीकार नहीं किया। यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 12 अगस्त को 29 राज्यों से जुड़ा एक अलग संघीय मुकदमा शुरू होने वाला है**, जिसमें युवाओं पर सोशल मीडिया के कथित प्रभाव और platform design से जुड़े आरोपों की सुनवाई होगी। यानी अमेरिका में बहस अब इस सवाल से आगे बढ़ चुकी है ।

अब सवाल है _ क्या सोशल मीडिया बच्चों के जीवन को प्रभावित करता है, और अगर करता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?”

यह कहानी भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक है।हमारे बच्चे भी उसी वैश्विक digital ecosystem का हिस्सा हैं। जुलाई में केंद्र सरकार ने Instagram पर कथित रूप से Child Sexual Exploitative and Abuse Material से जुड़े paid advertisements के मामले में Meta से जवाब मांगा। सरकार ने platform की ad-review व्यवस्था, content moderation और safeguards पर सवाल उठाए। Meta ने अपनी ओर से कहा है कि ऐसी सामग्री के प्रति उसकी zero-tolerance policy है और वह ऐसी गतिविधियों का पता लगाने तथा उन्हें हटाने के लिए तकनीक और विशेषज्ञ टीमों का इस्तेमाल करता है। सरकार को Meta का जवाब मिल चुका है और उसकी समीक्षा की जा रही है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत में social-media platforms को बच्चों से जुड़े ऐसे मामलों में निर्धारित SOPs का पालन करना होगा—जिसमें समय पर reporting, law-enforcement agencies के साथ coordination और संबंधित संस्थाओं के साथ सहयोग शामिल है।

यहां एक बात स्पष्ट है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल निजी कंपनियों का कारोबारी मामला नहीं रह गए हैं। जब उनका प्रभाव बच्चों की सुरक्षा, निजता, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार तक पहुंचता है, तब उनकी जवाबदेही भी सार्वजनिक प्रश्न बन जाती है।

माता-पिता का दायित्व: क्या स्क्रीन केवल एक ‘बेबीसिटर’ है?**

पर सवाल यह उठता है कि क्या सारी जिम्मेदारी कंपनियों पर डाल देना पर्याप्त है? शायद नहीं..., हमने बच्चों को स्मार्टफोन दिया..हमने उन्हें इंटरनेट दिया...कई बार हमने उन्हें व्यस्त रखने के लिए स्क्रीन थमा दी। फिर जब बच्चा उसी स्क्रीन में डूब गया तो हमने कहा “सोशल मीडिया खराब है।” लेकिन क्या हमने बच्चे को डिजिटल दुनिया का जिम्मेदार उपयोग करना सिखाया?

क्या हमने उसके साथ यह बातचीत की कि हर notification जरूरी नहीं होता?

क्या उसे बताया कि हर viral वीडियो सच नहीं होता?

क्या हमने उसके screen time पर स्वयं कोई सीमा तय की ? और क्या स्कूलों में 'Digital Literacy यानी डिजिटल साक्षरता" को उतनी गंभीरता मिली है, जितनी पारंपरिक विषयों को ?

बच्चे को केवल मोबाइल से दूर कर देना समाधान नहीं है।

उसे डिजिटल दुनिया में सुरक्षित, विवेकपूर्ण और जागरूक रहना सिखाना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।

Facebook मुफ्त है, Instagram मुफ्त है, कई social-media platforms मुफ्त हैं। लेकिन इस “मुफ्त” सुविधा की आर्थिक कीमत कहीं और वसूली जाती है...वह है आपके attention, आपके engagement, आपके व्यवहार और आपके डेटा के माध्यम की। प्लेटफॉर्म यह समझना चाहता है कि आपको क्या पसंद है, किस चीज पर आप रुकते हैं, किसे साझा करते हैं और किस वजह से दोबारा लौटते हैं। यही जानकारी उसके कारोबारी मॉडल का हिस्सा बनती है। इसलिए किसी बच्चे का लंबा screen time केवल उसके जीवन का निजी समय नहीं रहता। वह platform के लिए "engagement और संभावित आर्थिक मूल्य" में बदल सकता है और यहीं सबसे बड़ा टकराव पैदा होता है कि "बच्चे के लिए बेहतर क्या है और platform के लिए अधिक engagement क्या है, क्या दोनों हमेशा एक ही चीज हैं ?" यदि नहीं, तो बच्चों के मामले में कारोबारी प्रोत्साहनों पर अतिरिक्त सुरक्षा-सीमाएं क्यों न हों?

समस्या को केवल “सोशल मीडिया बंद करें या नहीं” के द्विध्रुवीय तर्क में बदलना उचित नहीं होगा। सोशल मीडिया के सकारात्मक उपयोग भी हैं, शिक्षा है..रचनात्मकता है...वैश्विक संवाद है..व्यवसाय है और नए अवसर हैं। "समस्या तकनीक का अस्तित्व नहीं है। समस्या यह है कि तकनीक किस तरह डिज़ाइन की जाती है और उसके प्रभाव की जिम्मेदारी कौन लेता है।" अगर कोई platform बच्चों के लिए नहीं है, तो उम्र की पहचान केवल एक checkbox पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। वहां privacy-preserving age assurance जैसी प्रभावी व्यवस्था पर विचार होना चाहिए। अगर कोई platform बच्चों को सुरक्षित रखने का दावा करता है, तो सुरक्षा केवल policy document में नहीं, उसके मूल product design में दिखाई देनी चाहिए।

सवाल तकनीक को रोकने का नहीं है। सवाल तकनीक को जिम्मेदार बनाने का है। भारत के पास Digital Personal Data Protection Act, 2023 और उसके तहत बनाए गए Digital Personal Data Protection Rules, 2025 के रूप में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा मौजूद है, लेकिन इसकी वास्तविक ताकत केवल कानून की किताब में नहीं, बल्कि उसके प्रभावी और चरणबद्ध "तकनीकी अनुपालन" में दिखाई देगी। केंद्र सरकार ने DPDP व्यवस्था के लिए अलग-अलग प्रावधानों के लिए चरणबद्ध commencement timeline तय की है; सभी प्रावधान एक ही दिन से लागू नहीं हुए हैं। यही कारण है कि अब अगला सवाल केवल कानून का नहीं है_ "क्या भारत के पास बच्चों की डिजिटल सुरक्षा लागू कराने की तकनीकी क्षमता और संस्थागत तैयारी भी है?"

भारत को अमेरिका या यूरोप की अदालतों के फैसलों का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। उसे दूसरे देशों के अनुभव से सीखते हुए अपना संतुलित मॉडल बनाना होगा, "न बच्चों को डिजिटल दुनिया से काटना, न उन्हें बिना सुरक्षा के एल्गोरिदम के हवाले करना।"

हमारे निम्न नीतिगत पांच सीधे सवाल है _

  • 1/ क्या भारत को बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग के लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय age-safety framework बनाना चाहिए ?

  • 2/ क्या platforms को नाबालिग उपयोगकर्ताओं की उम्र की प्रभावी और privacy-preserving पुष्टि के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए ?

  • 3/ क्या बच्चों के लिए endless scrolling, autoplay और लगातार notifications जैसे engagement-driven features पर विशेष safeguards अनिवार्य होने चाहिए ?

  • 4/ यदि किसी platform के design या recommendation system से बच्चों को गंभीर नुकसान पहुंचने का प्रमाण मिलता है, तो क्या केवल content creator नहीं, platform की भी कानूनी और आर्थिक जवाबदेही तय होनी चाहिए ?

  • 5/ क्या स्कूली शिक्षा में digital citizenship, online safety और AI literacy को भविष्य की अनिवार्य क्षमताओं के रूप में शामिल किया जाना चाहिए ?

इन पांच सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। लेकिन इन्हें टालना अब आसान नहीं होना चाहिए।

वास्तव में देखे तो, हर स्क्रीन बुरी नहीं है, हर social-media user addict नहीं है और हर technology company बच्चों की विरोधी नहीं है, लेकिन जब किसी कारोबारी मॉडल में उपयोगकर्ता का अधिक समय और engagement आर्थिक मूल्य पैदा करता हो, तब समाज को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि क्या बच्चों के मामले में मुनाफे और सुरक्षा के बीच एक स्पष्ट सीमा होनी चाहिए ? बच्चा सामान्य consumer नहीं है, उसकी आदतें बन रही हैं, उसका व्यक्तित्व विकसित हो रहा है, दुनिया को देखने और समझने का उसका तरीका आकार ले रहा है, इसलिए उसे केवल एक और "data point" या "engagement metric" में बदल देना पर्याप्त नहीं हो सकता। फैसला केवल सरकारों को नहीं करना है, अमेरिका में जनता सवाल पूछ रही है, अदालतें सवाल पूछ रही हैं, राज्य सरकारें कार्रवाई कर रही हैं। भारत में भी सरकार और नियामक संस्थाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर सवाल उठा रही हैं। दुनिया धीरे-धीरे एक ऐतिहासिक प्रश्न की ओर बढ़ रही है कि तकनीक कितनी शक्तिशाली हो सकती है और उसकी सीमा कौन तय करेगा ? कंपनी, एल्गोरिदम, बाजार, सरकार, माता-पिता या लोकतांत्रिक समाज ?

शायद उत्तर इनमें से किसी एक के पास नहीं है। जिम्मेदारी साझा होगी। लेकिन साझा जिम्मेदारी का अर्थ जवाबदेही का बिखर जाना नहीं होना चाहिए। क्योंकि आने वाली पीढ़ी एक दिन हमसे पूछेगी “जब आप जानते थे कि यह डिजिटल दुनिया हमारे ध्यान, हमारी आदतों और हमारे बचपन को प्रभावित कर सकती है, तब आपने हमारी रक्षा के लिए क्या किया था ?"

और शायद यही आज के समय का सबसे बड़ा सच है। बच्चों को केवल सोशल मीडिया से नहीं बचाना है। उन्हें उस डिजिटल व्यवस्था में सुरक्षित और सशक्त बनाना है, जहां उनका समय और उनका ध्यान आर्थिक मूल्य में बदल चुका है।.....और अंततः सवाल Meta को बंद करने का नहीं है।

सवाल यह है कि जब सामने एक बच्चे का बचपन हो, तब मुनाफे की सीमा कौन तय करेगा...कंपनी, एल्गोरिदम, बाजार, सरकार या समाज ?

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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