महापौर बनाम विधायक : पानी की मार, राजनीति में वार… इंदौर में भाजपा के भीतर दरार

जल संकट बना भाजपा के लिए नई टेंशन
इंदौर में इस बार गर्मी सिर्फ तापमान से नहीं, बल्कि पानी और राजनीति से भी तप रही है। शहर के जल संकट ने अब सत्ता के गलियारों में ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है कि भाजपा के दो बड़े चेहरे—महापौर पुष्यमित्र भार्गव और विधायक महेंद्र हार्डिया—आमने-सामने आ गए हैं। मामला इतना गरमा गया कि भूमिपूजन कार्यक्रम बीच में छोड़कर विधायक महेंद्र हार्डिया निकल गए और खुले मंच से भेदभाव के आरोप तक लगा दिए।
लेकिन इस राजनीतिक तनातनी की असली कहानी सिर्फ पानी की नहीं… बल्कि “पानी की टंकियों” की है।
40 टंकियां शहर को, लेकिन पांच नंबर को सिर्फ एक!
दरअसल अमृत-2 योजना के तहत शहर में 40 नई पानी की टंकियां बनाई जानी हैं। मगर इंदौर-5 विधानसभा को सिर्फ एक टंकी मिलने से विधायक हार्डिया बेहद नाराज बताए जा रहे हैं। यही नाराजगी अब खुलकर सामने आ गई है। सूत्रों की मानें तो हार्डिया का दर्द सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि जमीनी भी है। उनकी विधानसभा सबसे ज्यादा जल संकट झेल रही है। लोग पानी के लिए परेशान हैं, टैंकरों के पीछे भाग रहे हैं, जबकि शहर की दूसरी विधानसभाओं—एक, दो और राऊ—में हालात काफी बेहतर बताए जा रहे हैं। वहां टंकियां पूरी भर रही हैं और सप्लाई भी सामान्य है।
“मैं खुद बनवा रहा हूं टंकियां”
स्थिति इतनी खराब है कि विधायक हार्डिया अपनी विधायक निधि से चार अतिरिक्त टंकियां बनवाने की तैयारी कर चुके हैं। उनके करीबी मानते हैं कि अगर सरकार की योजना में पर्याप्त हिस्सेदारी मिलती तो शायद उन्हें खुद मैदान में नहीं उतरना पड़ता। उधर महापौर खेमे का तर्क भी कम दिलचस्प नहीं है। उनका कहना है कि निगम पहले से काम कर रहा था, लेकिन हार्डिया ने खुद टंकियां बनाने की घोषणा कर दी। टीम का दावा है कि बाद में उनसे लोकेशन मांगी गई तो उन्होंने सिर्फ दो जगह बताई। साथ ही यह भी याद दिलाया जा रहा है कि अमृत-1 योजना में सबसे ज्यादा टंकियां इंदौर-5 में ही बनी थीं।
यानी सवाल सिर्फ पानी का नहीं… “क्रेडिट” का भी है।
पर्दे के पीछे बढ़ता गया ‘प्रेशर’
राजनीति में अक्सर बड़े विस्फोट छोटे कारणों से होते हैं और यहां वही हुआ। हार्डिया आमतौर पर शांत स्वभाव के नेता माने जाते हैं, लेकिन इस बार समर्थक पार्षद तक आंदोलन की तैयारी में थे। हालांकि कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए हार्डिया ने उन्हें रोक दिया। लेकिन भीतर का दबाव कम नहीं हुआ। बताया जा रहा है कि भाजपा की कोर कमेटी की बैठक में भी यह मुद्दा उठ चुका था। यानी अंदर ही अंदर चल रही नाराजगी अब सार्वजनिक रूप ले चुकी है।
बोरवेल फेल… और पूरा सिस्टम हिल गया
इस बार गर्मी ने शहर की पानी व्यवस्था की पोल भी खोल दी। करीब 3500 सरकारी और 10 हजार निजी बोरवेल सूख या फेल हो चुके हैं। पूरा दबाव नर्मदा सप्लाई और टैंकर व्यवस्था पर आ गया है। नगर निगम पानी पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन कई इलाकों में हालात हाहाकार जैसे बने हुए हैं।
यानी जनता पानी के लिए परेशान है… और नेता जवाबदेही के लिए।
भाजपा संगठन अब ‘डैमेज कंट्रोल’ मोड में
महापौर और विधायक के बीच बढ़ती बयानबाजी से भाजपा संगठन की चिंता भी बढ़ गई है। मामला जनता के बीच पार्टी की छवि पर असर डालने लगा, तो अब संगठन ने मध्यस्थता शुरू कर दी है। नगर भाजपा अध्यक्ष सुमित मिश्रा दोनों नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। रणनीति बनाई जा रही है कि अब वार्ड स्तर पर पानी वितरण की निगरानी होगी, टैंकरों का हिसाब रखा जाएगा और कार्यकर्ताओं को भी मैदान में उतारा जाएगा।
मतलब साफ है—अब सिर्फ पानी नहीं, राजनीति की धार भी नियंत्रित करनी होगी।
सवाल बड़ा है…
इंदौर स्मार्ट सिटी बनने की दौड़ में देशभर में पहचान बना चुका है, लेकिन अगर पानी पर ही सियासत हावी हो गई तो जनता का गुस्सा किस दिशा में जाएगा, यह आने वाले दिनों में तय होगा। फिलहाल शहर में दो चीजें सबसे ज्यादा चर्चा में हैं—भीषण गर्मी… और भाजपा के भीतर बढ़ती गर्माहट।
आलोक त्रिपाठी
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