गरियाबंद का देवभोग जगन्नाथ मंदिर : जहां आज भी भगवान को दिया जाता है 'लगान' , 84 गांवों के किसान फसल का हिस्सा चढ़ाते हैं भगवान जगन्नाथ को

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का देवभोग जगन्नाथ मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत के कारण विशेष पहचान रखता है। ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर से जुड़े इस मंदिर में आज भी किसान अपनी उपज का एक हिस्सा भगवान जगन्नाथ को 'लगान' के रूप में अर्पित करते हैं। यह परंपरा क्षेत्र की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है।
84 गांवों ने लिया था ऐतिहासिक संकल्प
बताया जाता है कि वर्ष 1854 के आसपास इस क्षेत्र के 84 गांवों के प्रमुखों ने संकल्प लिया था कि हर वर्ष अपनी फसल का एक हिस्सा भगवान जगन्नाथ को समर्पित करेंगे। तभी से यहां के किसान सुगंधित चावल और मूंग दाल जैसी फसलों का हिस्सा मंदिर में अर्पित करते आ रहे हैं। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
पुरी जगन्नाथ मंदिर भेजा जाता है लगान का हिस्सा
रथयात्रा से पहले पुरी जगन्नाथ मंदिर का एक प्रतिनिधि (पंडा) हर साल देवभोग पहुंचता है। मंदिर में एकत्रित लगान का एक-चौथाई हिस्सा वह अपने साथ पुरी लेकर जाता है। मान्यता है कि पुरी में भगवान जगन्नाथ को सबसे पहले इसी सुगंधित चावल का भोग लगाया जाता है, जिससे दोनों मंदिरों का आध्यात्मिक संबंध आज भी कायम है।
'कुसुम भोग' से बना 'देवभोग'
ब्रिटिश शासनकाल में इस क्षेत्र का नाम 'कुसुम भोग' था। यहां से भगवान जगन्नाथ के भोग के लिए नियमित रूप से अनाज भेजे जाने की परंपरा के कारण बाद में इस क्षेत्र का नाम बदलकर 'देवभोग' रखा गया। यह नाम आज भी इस धार्मिक विरासत की पहचान बना हुआ है।
बिना सीमेंट और लोहे के बना भव्य मंदिर
देवभोग जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला भी लोगों को आकर्षित करती है। मंदिर के निर्माण में न तो सीमेंट का उपयोग किया गया और न ही लोहे की छड़ों का। पत्थरों को जोड़ने के लिए बेल, बबूल की गोंद, चिवड़ा और अन्य पारंपरिक देसी सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया। इसी पारंपरिक निर्माण शैली के कारण मंदिर को पूरी तरह बनने में करीब 47 वर्ष लगे और वर्ष 1901 में इसका निर्माण पूरा हुआ।
तीन पीढ़ियों ने पूरा कराया मंदिर निर्माण
मंदिर के निर्माण की शुरुआत तत्कालीन जमींदार भगवानो बेहेरा ने भूमि दान देकर कराई थी, लेकिन निर्माण के दौरान उनका निधन हो गया। इसके बाद रामचंद्र बेहेरा ने कार्य आगे बढ़ाया, पर उनका भी असमय निधन हो गया। अंततः बलभद्र बेहेरा ने वर्ष 1901 में मंदिर का निर्माण पूरा कराया। स्थानीय लोग इसे भगवान की इच्छा और दैवीय संयोग के रूप में देखते हैं। आज भी देवभोग जगन्नाथ मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं, ऐतिहासिक महत्व और पुरी जगन्नाथ मंदिर से जुड़े आध्यात्मिक संबंध के कारण श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
आलोक त्रिपाठी
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