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समय का सच : "दिया तले अंधेरा"

admin

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Nov 02, 2026
06:38 AM
"दिया तले अंधेरा"

- UMEESH GUPTA

दीपावली आने वाली है। बाजार सज चुके हैं, सरकारी इमारतों पर रोशनी की तैयारियां हैं, शहरों के चौराहे जगमगाने लगे हैं और भव्य दीपोत्सव के आयोजनों की रूपरेखा तैयार हो रही है। कहीं हजारों दीये जलाकर रिकॉर्ड बनाने की तैयारी है तो कहीं आतिशबाजी और रोशनी के बीच विकास की तस्वीर प्रस्तुत की जाएगी। कैमरे तैयार हैं, मंच सज रहे हैं और उपलब्धियों का बखान भी लगभग तय है। आखिर उत्सव है, तो उसका भव्य होना भी जरूरी है!

लेकिन इसी भव्यता के बीच एक छोटा-सा सवाल है, जिसका जवाब शायद किसी आयोजन के मंच से नहीं मिलेगा कि क्या इस रोशनी में उस गरीब की झोपड़ी भी दिखाई देती है, जिसके घर में आज भी अंधेरा है ?

हमारा देश उत्सवधर्मी है। यहां त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं। दीपावली अंधकार पर प्रकाश और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। लेकिन विडंबना देखिए कि प्रकाश पर्व मनाने वाले समाज में अंधेरा केवल बिजली की अनुपलब्धता का नाम नहीं रह गया है_ वरन यह भूख का अंधेरा है, बेरोजगारी का अंधेरा है, आर्थिक असमानता का अंधेरा है और उस व्यवस्था का अंधेरा है, जो गरीब के नाम पर योजनाएं तो बनाती है, लेकिन उसकी जिंदगी में बदलाव की वास्तविक रोशनी पहुंचाने में अक्सर पीछे रह जाती है।

एक तरफ शहरों में लाखों रुपये की सजावट होगी, महंगे बाजारों में खरीदारी होगी, उपहारों का आदान-प्रदान होगा और सोशल मीडिया पर खुशियों की तस्वीरें साझा की जाएंगी। दूसरी तरफ किसी झोपड़ी में बैठा पिता बच्चों की फरमाइशें सुनकर चुप हो जाएगा। बच्चे नए कपड़ों की उम्मीद लगाए होंगे और मां घर में उपलब्ध थोड़े-से सामान से मिठाई बनाने की कोशिश कर रही होगी। पिता बाजार की देहरी पर ठिठककर कीमतें देखेगा और चुपचाप समझ जाएगा कि इस बार भी त्योहार का फैसला उसकी इच्छाएं नहीं, उसकी विवश जेब करेगी। बाहर पटाखे फूटेंगे, भीतर उम्मीदें खामोशी से बुझेंगी। यही उस भारत की तस्वीर है, जो भव्य आयोजनों के पोस्टरों में दिखाई नहीं देता।

व्यवस्था की विडंबना भी कम दिलचस्प नहीं है। गरीब के नाम पर आवास योजना है, बिजली योजना है, खाद्य सुरक्षा है, रोजगार योजनाएं हैं और सामाजिक कल्याण की लंबी सूची है। सरकारी दस्तावेजों में उपलब्धियां दर्ज होती हैं, विज्ञापनों में लाभार्थियों की मुस्कुराती तस्वीरें दिखाई जाती हैं और भाषणों में अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचने का दावा किया जाता है। लेकिन कभी-कभी जमीनी हकीकत इन दावों से अलग कहानी कहती है। फाइलों में गरीब का घर बन चुका होता है, योजनाओं में उसके घर बिजली पहुंच चुकी होती है और प्रचार में उसका जीवन बदल चुका होता है। बस एक छोटी-सी समस्या रह जाती है_ "कभी-कभी गरीब को खुद इसकी जानकारी नहीं होती!"

सवाल यह नहीं कि दीपोत्सव के आयोजन क्यों हों, सवाल यह है कि _

  • विकास की प्राथमिकताओं में उनका स्थान क्या है ?

  • सांस्कृतिक आयोजन आवश्यक हैं, पर क्या उनकी भव्यता के समानांतर नागरिकों की बुनियादी जरूरतों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाती है ?

  • जिस शहर में रोशनी के लिए विशेष बजट बनाया जा सकता है, वहां झुग्गी बस्तियों की मूलभूत सुविधाओं के लिए कितनी संवेदनशीलता दिखाई जाती है ?

  • जिस व्यवस्था के पास उत्सव को ऐतिहासिक बनाने की योजना है, क्या उसके पास गरीब के जीवन को बेहतर बनाने की भी कोई ठोस समयसीमा है ?

हमारे यहां विकास को प्रदर्शित करने की कला ने काफी तरक्की कर ली है। सड़क पर झालर लग जाए, सरकारी भवन रोशन हो जाए, आयोजन स्थल पर हजारों दीये सजा दिए जाएं तो तस्वीर शानदार बन जाती है। लेकिन विकास की असली परीक्षा उस कैमरे के फ्रेम के बाहर होती है। वहां मजदूर अपनी अगली दिहाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा होता है, किसान लागत और आमदनी के बीच उलझा होता है, रेहड़ी वाला त्योहार में बिक्री बढ़ने की उम्मीद लगाए बैठा होता है और फुटपाथ पर रहने वाला परिवार मौसम की मार से बचने की चिंता में होता है। इन लोगों के जीवन में रोशनी किसी सरकारी आयोजन से नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार, उचित आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित आवास से आएगी।

बाजार ने भी त्योहारों की परिभाषा बदल दी है। अब दीपावली का अर्थ केवल दीप जलाना नहीं, बल्कि कितना खरीदा, कितना खर्च किया और कितना दिखाया, यह भी हो गया है। विज्ञापन हमें बताते हैं कि खुशी किस ब्रांड के साथ मिलेगी, किस उपहार से रिश्ते मजबूत होंगे और किस खरीदारी से त्योहार यादगार बनेगा। लेकिन इस चमकदार बाजार में वह व्यक्ति कहां खड़ा है, जिसकी पूरी मासिक आमदनी परिवार का खर्च चलाने में समाप्त हो जाती है? उसके लिए भी दीपावली आती है, लेकिन उसकी खुशियों का बजट बाजार तय नहीं करता, उसकी मजबूरियां तय करती हैं।

समाज की संवेदनहीनता भी इस अंधेरे को गहरा करती है। त्योहार पर गरीब के घर मिठाई का डिब्बा पहुंचाकर तस्वीर खिंचवाना आसान है, लेकिन उसकी गरीबी के कारणों पर सवाल उठाना असुविधाजनक। एक दिन किसी जरूरतमंद को उपहार देकर हम अपने सामाजिक दायित्व की इतिश्री समझ लेते हैं। लेकिन क्या किसी को एक दिन की मिठाई देना पर्याप्त है, जब उसे साल भर सम्मानजनक जीवन के अवसर ही न मिलें ? गरीब को दया नहीं, अधिकार चाहिए। उसे कृपा की नहीं, अवसर की जरूरत है। उसे त्योहार पर सहायता से अधिक जरूरी है कि उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, परिवार को इलाज मिले और घर में नियमित चूल्हा जल सके।

यहाँ तक कि विडंबना यह भी है कि दीपावली के सुंदर दीप जलाने वाले हाथ ही, उन दीपों को और सुंदर आकृतियों में ढालने वाले कुम्हार के घर अंधेरा छोड़ जाते हैं। सफाईकर्मी, निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार और छोटे दुकानदार केवल व्यवस्था के सहायक पात्र नहीं, बल्कि उसी समाज की रीढ़ हैं, जिसकी चमक पर हम गर्व करते हैं।

यहां सरकार और समाज, दोनों की जिम्मेदारी है। सरकारों को योजनाओं की संख्या से अधिक उनके वास्तविक परिणामों पर ध्यान देना होगा। जनप्रतिनिधियों को भव्य आयोजनों के साथ उन बस्तियों में भी जाना होगा, जहां विकास के दावे अभी पहुंचने बाकी हैं। वहीं समाज को भी अपनी खुशियों के दायरे में उन लोगों को शामिल करना होगा, जिनके श्रम से हमारे घर, बाजार और शहर चलते हैं। हालांकि, इसके साथ ही देश में कुछ ऐसे संवेदनशील प्रयास भी दिखाई देते हैं, जहां स्थानीय समाज और जागरूक नागरिकों ने मिलकर 'सबकी दीपावली' मनाने का बीड़ा उठाया है, ऐसे मॉडल यह बताते हैं कि यदि नीयत साफ हो, तो आत्मीयता की रोशनी हर झोपड़ी तक पहुंच सकती है।

दीपावली का वास्तविक संदेश केवल बाहर दीये जलाना नहीं, बल्कि भीतर के अंधकार को पहचानना भी है। यदि किसी बच्चे के पास शिक्षा नहीं, किसी परिवार के पास सुरक्षित छत नहीं, किसी बीमार के पास इलाज नहीं और किसी मेहनतकश के पास सम्मानजनक आजीविका नहीं, तो हमारी रोशनी अधूरी है। किसी देश की प्रगति का मूल्यांकन उसके सबसे भव्य आयोजन से नहीं, बल्कि उसके सबसे कमजोर नागरिक की स्थिति से होना चाहिए।

इस दीपावली जब घरों में दीये जलें, तो एक बार उन झोपड़ियों की ओर भी देखिएगा, जहां रोशनी अभी मेहमान है। सरकारें भी अपने विकास के दावों की चमक से बाहर निकलकर उन अंधेरे कोनों को देखें, जिन्हें आंकड़ों और विज्ञापनों के सहारे ढका नहीं जा सकता। क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल उत्सवों की दर्शक नहीं, बल्कि विकास की वास्तविक भागीदार है।

आखिर कब तक हम अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाते रहेंगे, जबकि अंधकार से लड़ने की जिम्मेदारी केवल गरीब के हिस्से आती रहेगी ? दीपावली के दीये हर साल जलेंगे, आयोजन हर साल भव्य होंगे और उपलब्धियों के दावे भी दोहराए जाएंगे। लेकिन देश की वास्तविक प्रगति उस दिन दिखाई देगी, जब किसी गरीब की झोपड़ी में रोशनी पहुंचाने के लिए किसी विशेष अभियान, किसी उत्सव या किसी कैमरे की जरूरत नहीं पड़ेगी।

क्योंकि जिस देश में राजपथ से लेकर बाजार तक रोशनी हो, लेकिन गरीब की दहलीज अंधेरे में डूबी रहे, वहां समस्या दीयों की कमी नहीं, व्यवस्था की दृष्टि की कमी है। दीपक की लौ सिर्फ मकान को नहीं, मन और व्यवस्था की आंखें भी रोशन करे, यही इस पर्व का सच्चा संदेश होना चाहिए।

और यही है हमारे समय का सबसे बड़ा सच _"दिया तले अंधेरा !"

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं


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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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