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"सवाल जो कोई नहीं पूछता" : हमारी संवेदनाएँ और भूख हड़ताल

admin

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Jul 17, 2026
10:09 AM
हमारी संवेदनाएँ और भूख हड़ताल

- UMEESH GUPTA

"सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना।

न होना तड़प का,

सब सहन कर जाना।

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना।"

"पाश"

पाश ने यह कविता किसी एक आंदोलन के लिए नहीं लिखी थी। उन्होंने उस समाज के लिए लिखी थी, जहाँ सबसे बड़ा संकट अन्याय नहीं....अन्याय का सामान्य हो जाना होता है।

और, शायद इसलिए मेरा मन बार-बार जंतर-मंतर लौट जाता है।

लेकिन सच कहूँ...

यह लेख जंतर-मंतर का नहीं है। यह लेख हमारा है।क्योंकि हर युग में एक जंतर-मंतर होता है।हर युग में कोई अपनी अंतिम आशा लेकर बैठा होता है और हर युग में एक समाज तय करता है कि _"उसे दर्शक बनना है या नागरिक।"

प्रश्न यह नहीं कि वहाँ बैठा व्यक्ति सही है या ग़लत।प्रश्न यह भी नहीं कि उसकी माँगें उचित हैं या अनुचित।

प्रश्न केवल इतना है_

जब किसी लोकतंत्र में किसी नागरिक को अपनी बात सुनाने के लिए अपने शरीर को ही तर्क बनाना पड़े? यदि इस प्रश्न से भी हमारी आत्मा विचलित नहीं होती...

तो शायद भूख केवल उस व्यक्ति की नहीं है। भूख हमारी संवेदनाओं में भी उतर चुकी है।

तभी तो ऐसे हालातों के लिए किसी ने लिखा है कि _

"लड़ो।

लड़ नहीं सकते तो बोलो..

बोल नहीं सकते तो लिखो..

लिख नहीं सकते तो साथ दो..

साथ नहीं दे सकते तो जो लड़ रहे हैं उनका मनोबल मत तोड़ो...

क्योंकि वे तुम्हारे हिस्से की लड़ाई लड़ रहे हैं।"

इतिहास केवल संघर्ष करने वालों का नहीं लिखा जाता...इतिहास मौन रहने वालों का भी लिखा जाता है_

महाभारत में दुर्योधन अकेला नहीं था_

सभा में भीष्म थे,

द्रोण थे,

कृपाचार्य थे,

विदुर थे,

धर्म को पहचानने वाले भी थे...

लेकिन धर्म के पक्ष में खड़े होने वाले बहुत कम थे।

अन्याय सबने देखा,

अपमान सबने देखा,

लेकिन...

अधिकांश ने मौन चुन लिया।

अतः महाभारत का सबसे बड़ा संदेश "युद्ध" नहीं है।

उसका सबसे बड़ा संदेश है_

"जब समाज का विवेक मौन हो जाता है,

तब युद्ध केवल कुरुक्षेत्र में नहीं,मनुष्य के भीतर भी शुरू हो जाता है।"

"युग बदलते हैं।

राजा बदलते हैं।

सरकारें बदलती हैं।

संघर्ष बदलते हैं।

लेकिन...

कुरुक्षेत्र कभी समाप्त नहीं होता।

वह हर पीढ़ी से केवल एक प्रश्न पूछता है_

"तुम किस ओर थे?"

तभी तो किसी ने कहा है कि_

"कुछ लोग लड़ रहे हैं,

कुछ लोग लिख रहे हैं,

कुछ लोग साथ खड़े हैं,

और बाकी...

सिर्फ़ देख रहे हैं।"

और यदि हम फिर भी मौन रहे...तो...

सभ्यताएँ अचानक नहीं मरतीं।

पहले प्रश्न मरते हैं।

फिर प्रतिरोध मरता है।

फिर संवेदनाएँ मरती हैं।

और अंत में...

राष्ट्र जीवित रहते हैं...

लेकिन समाज मर जाते हैं।

क्योंकि...

किसी भी देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि वहाँ संघर्ष होते हैं।सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि..."संघर्ष"समाज को विचलित करना बंद कर दें, समाज बेअसर रहे उस संघर्ष से।

आज का सवाल...

जब आने वाली पीढ़ियाँ इस समय को पढ़ेंगी...तो क्या वे यह लिखेंगी ??

कि भारत में कुछ लोग भूखे थे...

या यह लिखेंगी_

कि भारत में बहुत लोग "संवेदनहीन"थे?

"पाश"ने चेताया था_

"सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना..."

शायद इसलिए...

इतिहास में अत्याचारी कभी अकेले नहीं जीतते,उन्हें सबसे बड़ी ताकत "समाज की चुप्पी"देती है।

और अंत में...

कल्पना कीजिए...बीस वर्ष बाद...आपका बेटा...या आपकी पोती...इतिहास की कोई किताब पढ़ते हुए आपसे पूछे_

"जब आपके समय में लोग न्याय के लिए संघर्ष कर रहे थे... तब आप कहाँ थे?"

उस प्रश्न का उत्तर...

किसी किताब में नहीं मिलेगा....वह उत्तर...आपको स्वयं देना होगा......मुझे इसका उत्तर मत दीजिए....आज आप केवल अपने भीतर झाँकिए।

क्योंकि...

इतिहास केवल इतना पूछता है_ कि जब अन्याय तुम्हारी आँखों के सामने था..."तब तुम कहाँ थे?"

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं


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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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