संघर्ष को सलाम! : राजनांदगांव की बेटी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में जीता रजत, 199 किलो वजन उठाकर वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी ने बढ़ाया देश का मान

राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव की बेटी अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी यादव ने अपने संघर्ष और मेहनत को एक बार फिर बड़ी उपलब्धि में बदल दिया। स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में सोमवार को आयोजित राष्ट्रमंडल खेल-2026 की 53 किलोग्राम महिला वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में ज्ञानेश्वरी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक अपने नाम किया। उन्होंने कुल 199 किलोग्राम वजन उठाया, जिसमें स्नैच में 88 किलोग्राम और क्लीन एंड जर्क में 111 किलोग्राम शामिल रहा।
199 किलो वजन उठाकर देश का बढ़ाया मान
ज्ञानेश्वरी के शानदार प्रदर्शन के बावजूद स्वर्ण पदक नाइजीरिया की ओनोमे ओमोलोला डिडिह ने 206 किलोग्राम वजन उठाकर जीता। वहीं कनाडा की रेबेका ग्रूलक्स ने 178 किलोग्राम के साथ कांस्य पदक हासिल किया। ज्ञानेश्वरी का रजत पदक उनके करियर की एक और बड़ी उपलब्धि है। वर्ष 2022 से वह लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर अपनी अलग पहचान बना रही हैं।
भाई अस्पताल में, फिर भी नहीं टूटा हौसला
ज्ञानेश्वरी की यह सफलता ऐसे समय में आई है, जब उनका भाई रितेश यादव दुर्घटना में घायल होकर अस्पताल में भर्ती है। माता-पिता उसकी देखभाल में जुटे हैं। परिवार के अनुसार, ज्ञानेश्वरी ने अपने भाई से बातचीत कर उसका हालचाल जाना था और उससे पदक जीतने का वादा किया था। ग्लास्गो में शानदार प्रदर्शन कर उन्होंने अपना यह वादा पूरा कर दिया।
पिता के संघर्ष ने बेटी को बनाया चैंपियन
ज्ञानेश्वरी की सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष, पिता का पसीना और पूरे परिवार का त्याग छिपा है। उनकी खेल यात्रा किसी बड़े स्टेडियम से नहीं, बल्कि राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई। सातवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान वह अपने पिता दीपक यादव के साथ व्यायामशाला जाने लगी थीं। बेटी की प्रतिभा और लगन देखकर पिता ने कोच अजय लोहार से उन्हें वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण दिलाना शुरू किया।
तीन से पांच हजार की कमाई में उठाया प्रशिक्षण का खर्च
ज्ञानेश्वरी के परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक स्थिति थी। पिता दीपक इलेक्ट्रिशियन का काम कर महीने में करीब तीन से पांच हजार रुपये कमाते थे। इसी सीमित आय से परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और ज्ञानेश्वरी की डाइट, खेल किट, जूते और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाया जाता था। परिवार ने कई बार अपनी जरूरतों से समझौता किया, लेकिन बेटी के प्रशिक्षण में कोई कमी नहीं आने दी।
साइकिल से रोज आठ किलोमीटर का सफर
ग्राम भोड़िया से दीपक यादव रोजाना करीब आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर बच्चों को राजनांदगांव लाते थे। बच्चे स्कूल जाने के बाद व्यायामशाला में घंटों अभ्यास करते और रात करीब 11 बजे पूरा परिवार उसी साइकिल से गांव लौटता था। सीमित संसाधनों के बावजूद पिता ने बेटी के सपनों को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
दीपक ने कई बार 20-20 घंटे तक काम किया, ताकि ज्ञानेश्वरी की डाइट और तैयारी प्रभावित न हो। पासपोर्ट बनवाने से लेकर विदेशों में होने वाली प्रतियोगिताओं की तैयारी तक उन्होंने हर जिम्मेदारी पूरी की। आज ज्ञानेश्वरी की सफलता साबित करती है कि मजबूत हौसले, परिवार के त्याग और निरंतर मेहनत से संघर्ष की राह पर चलकर भी इतिहास रचा जा सकता है।
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