लखनऊ अग्निकांड : डेथ ट्रैप बन चुकी थी इमारत, जांच में खुली सिस्टम की लापरवाही की परतें, 15 लोगों की गई थी जान

लखनऊ। लखनऊ के अलीगंज इलाके में तीन मंजिला इमारत में लगी भीषण आग ने 15 लोगों की जान ले ली। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह इमारत सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण एक डेथ ट्रैप बन चुकी थी। इमारत में आने-जाने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता था, जो एयर कंडीशनिंग पैनल, बिजली के तारों और अन्य उपकरणों से घिरा हुआ था। आग लगने के बाद लोगों के पास बाहर निकलने का कोई सुरक्षित विकल्प नहीं बचा।
एलडीए जांच में 18 अधिकारी और इंजीनियर दोषी
हादसे के बाद हुई जांच में लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के 18 अधिकारी और इंजीनियरों को जिम्मेदार माना गया है। एलडीए उपाध्यक्ष ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करते हुए रिपोर्ट शासन को भेज दी है। दोषियों में पांच जोनल अधिकारी समेत कई इंजीनियर और संबंधित अधिकारी शामिल हैं। इससे पहले एलडीए एक जूनियर इंजीनियर और एक असिस्टेंट इंजीनियर को निलंबित भी कर चुका है।
रिहायशी इमारत का हो रहा था व्यावसायिक इस्तेमाल
जांच में बड़ा खुलासा हुआ है कि जिस इमारत का नक्शा आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था, उसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था। इतना ही नहीं, वर्ष 2016 में अवैध निर्माण के खिलाफ जारी ध्वस्तीकरण आदेश को बाद में निरस्त कर दिया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, तत्कालीन विहित प्राधिकारी ने उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिससे अवैध गतिविधियां जारी रहीं।
धुएं ने ली सबसे ज्यादा जानें
जांच में पता चला है कि इमारत में धुआं बाहर निकालने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। आग लगने के बाद कुछ ही मिनटों में पूरा भवन धुएं से भर गया और ज्यादातर लोगों की मौत दम घुटने की वजह से हुई। हालात इतने गंभीर थे कि बचाव दल को अंदर पहुंचने के लिए दीवार तोड़नी पड़ी। अग्निशमन विभाग और एनडीआरएफ की टीम ने कई घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया।
सुरक्षा मानकों की खुली पोल
एफआईआर में कई गंभीर लापरवाहियों का जिक्र किया गया है। इमारत में फायर सेफ्टी के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे और आपात स्थिति में बाहर निकलने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता मौजूद नहीं था। बिजली की वायरिंग और एसी के उपकरण भी सुरक्षा मानकों के विपरीत लगाए गए थे।
इस हादसे ने प्रशासनिक निगरानी और शहरी नियोजन व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जांच इस बात पर भी केंद्रित है कि रिहायशी इलाके में स्वीकृत इमारत वर्षों तक व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कैसे इस्तेमाल होती रही और जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की।
प्रफुल्ल तिवारी
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
