सवाल जो कोई नहीं पूछता : "सुख-सुविधाओं के उजालों में रिश्तों का अंधेरा: एक वैचारिक मंथन"

- UMEESH GUPTA
धनतेरस है। बाजारों में समृद्धि उतर आई है। सोने-चांदी की दुकानों पर भीड़ है, बर्तनों की खनक है, नई गाड़ियों की बुकिंग है और घरों में खरीदारी की सूचियां तैयार हैं। कोई लक्ष्मी के स्वागत के लिए चांदी खरीद रहा है, कोई शुभता के नाम पर नया वाहन और कोई अपनी सामाजिक हैसियत के अनुरूप खरीदारी की तैयारी में है। घरों की सफाई हो रही है, सजावट के सामान आ रहे हैं और दीपावली की खुशियों का हिसाब लगाया जा रहा है। लेकिन इस उत्सवी शोर में एक सवाल कहीं दब गया है_
जिस घर में इतना धन, इतनी सुविधाएं और इतनी रोशनी आ रही है, वहां रहने वाले लोगों के बीच अपनापन इतना कम क्यों होता जा रहा है?
भौतिकतावाद और बाजारवाद का शिकंजा
हमने घरों को सजाने की कला में खूब तरक्की की है, लेकिन परिवार को संवारने की कला शायद कहीं पीछे छोड़ दी है। अब घर में कौन-सा सोफा आएगा, कौन-सी लाइट लगेगी, किस ब्रांड का पर्दा होगा और पूजा की सजावट कैसी होगी, इसकी तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है। लेकिन परिवार के सदस्य आखिरी बार कब बिना किसी औपचारिकता के साथ बैठे थे, किसने किसकी परेशानी सुनी थी और किसने किससे मन की बात की थी, इसका कोई हिसाब नहीं रखता। घर में स्मार्ट टीवी है, स्मार्टफोन है, स्मार्ट उपकरण हैं, लेकिन परिवार के संवाद को स्मार्ट बनाने की कोई योजना नहीं है। तकनीक ने हमारी सुविधाएं बढ़ाई हैं, मगर रिश्तों की मरम्मत का कोई ऐप अब तक नहीं बना।
धनतेरस पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है। लेकिन आज सोने की शुद्धता जांचने वाले समाज में रिश्तों की शुद्धता जांचने की परंपरा कमजोर पड़ती जा रही है। किसने कितने कैरेट का सोना खरीदा, किसने कितनी महंगी गाड़ी ली, किसके घर कितना खर्च हुआ और किसने किसे कितना महंगा उपहार दिया, इन सबका हिसाब है। बस इस बात का हिसाब नहीं कि किसने अपने माता-पिता को कितना समय दिया, किसने अपने जीवनसाथी की खामोशी पढ़ी और किसने भाई-बहन के बीच वर्षों से जमा शिकायतों को खत्म करने की कोशिश की। लगता है हमने रिश्तों का मूल्यांकन भी बाजार की रसीदों से करना शुरू कर दिया है।
बुजुर्गों की उपेक्षा और 'सुविधाजनक देखभाल' का मॉडल
परिवार की सबसे बड़ी विडंबना उन माता-पिता के जीवन में दिखाई देती है, जिन्होंने अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए अपना वर्तमान तक खर्च कर दिया। बच्चों की पढ़ाई, नौकरी, शादी, मकान और प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने अपनी इच्छाओं को बार-बार स्थगित किया। कभी अपने लिए अच्छे कपड़े नहीं खरीदे, कभी घूमने की इच्छा छोड़ दी और कभी अपनी बीमारी को भी बच्चों की व्यस्तता समझकर छिपा लिया।
अब बच्चे सफल हैं, घर बड़े हैं, सुविधाएं पर्याप्त हैं और माता-पिता के लिए अलग कमरा भी है। बस उस कमरे में बैठकर उनकी बातें सुनने वाला कोई नहीं। माता-पिता के जन्मदिन पर ऑनलाइन उपहार पहुंच जाता है, त्योहार पर शुभकामना संदेश भी आ जाता है, लेकिन उनके पास बैठने का समय अक्सर नहीं पहुंचता। आधुनिक परिवार ने बुजुर्गों की देखभाल का एक सुविधाजनक मॉडल विकसित कर लिया है, सुविधाएं उपलब्ध करा दीजिए, उपस्थिति की आवश्यकता समाप्त मान लीजिए!
डिजिटल युग के मौन रिश्ते और महिलाओं का अदृश्य श्रम-
पति-पत्नी के रिश्तों में भी एक नया विरोधाभास दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर प्रेम का प्रदर्शन बढ़ा है, लेकिन निजी जीवन में संवाद कई बार घटा है। तस्वीरों में मुस्कुराते चेहरे, महंगे उपहार और साथ बिताए पलों की खूबसूरत झलकियां हैं। लेकिन उस मुस्कान के पीछे कितनी अनकही शिकायतें हैं, यह किसी तस्वीर में नहीं दिखता। घर के खर्च, बच्चों की फीस, बैंक की किश्तें और सामाजिक जिम्मेदारियां तो साझा होती हैं, लेकिन मन की थकान साझा करने का अवसर कम होता जा रहा है। भाई-बहनों के रिश्तों की कहानी भी कुछ अलग नहीं है, बचपन की साझी स्मृतियां अब संपत्ति और हिस्से-बंटवारे की दीवारों के पीछे छुप गई हैं। और इस पूरे उत्सव में उस महिला को कौन देखता है, जो घर की रोशनी के पीछे सबसे अधिक श्रम करती है? घर की सफाई, पकवान, पूजा की तैयारी, मेहमानों का स्वागत और परिवार की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखने में उसका समय और ऊर्जा खर्च होती है। सबके नए कपड़े आ जाते हैं, सबकी पसंद का भोजन बन जाता है, घर की हर चीज व्यवस्थित हो जाती है। लेकिन क्या किसी ने उससे पूछा कि इस त्योहार पर उसकी अपनी इच्छा क्या है? घर की लक्ष्मी कहकर उसका सम्मान तो किया जाता है, लेकिन घर के श्रम में बराबर भागीदारी देने की बात आते ही कई बार परंपराएं याद आने लगती हैं।
दिखावे की संस्कृति और बाजार की चतुराई
सोशल मीडिया ने इस दिखावे को एक नया मंच दे दिया है। अब दीपावली केवल मनाई नहीं जाती, प्रदर्शित भी की जाती है। तस्वीर में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा होता है, लेकिन कैमरा बंद होने के बाद कौन किससे बात करता है, यह कोई नहीं दिखता। अब कई बार त्योहार की सफलता इस बात से मापी जाती है कि कितने लोगों ने हमारी तस्वीर पसंद की, न कि इस बात से कि परिवार के कितने लोग वास्तव में खुश थे।
बाजार ने हमारे त्योहारों को खरीदारी के अवसर में बदल दिया है। वह बताता है कि प्रेम जताना है तो उपहार खरीदिए, सम्मान देना है तो महंगा सामान दीजिए और रिश्ते मजबूत करने हैं तो विशेष ऑफर का लाभ उठाइए। लेकिन बाजार यह नहीं बताता कि माता-पिता के साथ बिताए गए दो घंटे की कीमत क्या है, जीवनसाथी की बात धैर्य से सुनने का मूल्य क्या है और किसी नाराज भाई को गले लगाने का कौन-सा ऑफर उपलब्ध है।
निष्कर्ष और आत्ममंथन: दीयों के उजाले में अपनों की तलाश_
यह भी सच है कि बदलती जीवनशैली और आर्थिक दबाव पारिवारिक संबंधों को प्रभावित करते हैं। हर दूरी को स्वार्थ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन व्यस्तता को रिश्तों की उपेक्षा का स्थायी बहाना बना लेना भी सही नहीं है। आधुनिकता ने हमें अपने निर्णय लेने का अधिकार दिया है, अपनों के प्रति संवेदनहीन होने का लाइसेंस नहीं।
इस धनतेरस पर एक बार घर की अलमारियों, बैंक खातों और खरीदारी की रसीदों से आगे भी देखिए। कहीं कोई रिश्ता आपकी प्रतीक्षा में तो नहीं है? कोई माता-पिता आपकी आवाज सुनने के लिए तो नहीं तरस रहे? कोई जीवनसाथी आपकी मौजूदगी में भी अकेला तो नहीं है?
धनतेरस पर सोना खरीदने की परंपरा अपनी जगह है, लेकिन शायद इस बार परिवार के लिए कुछ ऐसा भी खरीदना चाहिए जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती_थोड़ा समय, थोड़ा सम्मान, थोड़ा धैर्य और थोड़ा अपनापन।
घर की दीवारें रंगने से घर सुंदर होता है, महंगे सामान से घर समृद्ध होता है, लेकिन परिवार तब बनता है जब लोग एक-दूसरे के लिए उपलब्ध होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि हमने घर की हर चीज का मूल्य बढ़ाया, लेकिन रिश्तों का महत्व घटा दिया।
दीये तो इस बार भी जलेंगे, सवाल सिर्फ इतना है_क्या उनके उजाले में हम अपने परिवार का खोता हुआ चेहरा भी देख पाएंगे?
यह आलेख सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि इस धनतेरस अपनों के साथ कुछ अनमोल पल साझा करने की एक वैचारिक चेतावनी है।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
