सवाल जो कोई नहीं पूंछता : आजादी के 79 साल बाद, गांधी और शास्त्री क्यों जरूरी हैं?

- UMEESH GUPTA
2 अक्टूबर आते ही हम तस्वीरों पर फूल चढ़ाते हैं, भाषण देते हैं और श्रद्धांजलि अर्पण की औपचारिकता पूरी करते हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि "हम गांधी और शास्त्री को कितना याद करते हैं?"
असली सवाल यह है "क्या हम उनके जीवन से अपने लिए कोई सवाल भी करते हैं?"
किसी महान व्यक्ति को याद करना आसान है। उसके जीवन को अपने व्यवहार का आईना बनाना कठिन, और शायद यही वह सवाल है, जो हम पूछना नहीं चाहते।
बाहर का शोर या भीतर का सन्नाटा?
आज भारत पहले से कहीं अधिक सुविधासंपन्न और तकनीकी रूप से सक्षम है। सूचना हमारी मुट्ठी में है। सोशल मीडिया ने आम नागरिक को अपनी बात रखने का अभूतपूर्व मंच दिया है। लेकिन इसी के साथ एक विरोधाभास भी पैदा हुआ है । हमारे पास बोलने के साधन बढ़े हैं, लेकिन "चुप रहने की क्षमता" क्या उतनी ही बढ़ी है?
हम तुरंत प्रतिक्रिया देना चाहते हैं। तुरंत जवाब देना चाहते हैं। तुरंत परिणाम चाहते हैं और तुरंत पहचान चाहते हैं।
सवाल यह है कि किसी खबर पर प्रतिक्रिया देने से पहले हमारे पास उसे समझने का धैर्य कितना है? किसी असहमति को सुनने की क्षमता कितनी है? और गुस्से में लिखे गए शब्दों को रोक लेने का आत्मसंयम कितना है?
"शायद आज के समय में आत्मसंयम सबसे कम चर्चित और सबसे ज्यादा जरूरी नागरिक गुणों में से एक है।"
गांधी के लिए सत्य केवल बोलने का विषय नहीं था; सत्य का संबंध विचार, व्यवहार और जीवन-पद्धति से भी था। इसलिए गांधी को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर के सामने सिर झुकाना नहीं है, बल्कि उनके सिद्धांतों के सामने अपने जीवन को खड़ा करना है।
गांधी से आज हम क्या पूछें?
गांधी को मानना आसान है। उनका नाम लेना आसान है। उनके सिद्धांतों पर भाषण देना भी आसान है। लेकिन कठिन है खुद से पूछना-
क्या मैं असहमति को स्वीकार कर सकता हूँ?
क्या मैं अपने विरोधी को भी मनुष्य की तरह देख सकता हूँ?
क्या मैं क्रोध में वह शब्द बोलने से खुद को रोक सकता हूँ, जिसे बाद में वापस नहीं लिया जा सकता?
क्या मैं अपनी गलती स्वीकार कर सकता हूँ?
और सबसे महत्वपूर्ण_क्या मैं दूसरों से जिस नैतिकता की अपेक्षा करता हूँ, उसे अपने जीवन में लागू करता हूँ?
गांधी की प्रासंगिकता इसी आत्मपरीक्षण में है। उनकी विरासत हमें केवल यह नहीं बताती कि देश कैसा होना चाहिए, वह यह भी पूछती है कि "नागरिक कैसा होना चाहिए?"
पद और जिम्मेदारी का संतुलन: शास्त्री जी का सवाल
लाल बहादुर शास्त्री की सार्वजनिक विरासत एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखती है_"पद और जिम्मेदारी का संबंध क्या है?"
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी पहचान सादगी और विनम्रता से जुड़ी रही। रेल मंत्री के रूप में एक बड़ी दुर्घटना के बाद उनका इस्तीफा सार्वजनिक जवाबदेही का अनुपम उदाहरण है।
आज हम अक्सर पूछते हैं कि किसके पास कितनी शक्ति है? किसके पास कितना प्रभाव है? किसके पास कितने संसाधन हैं? लेकिन एक सवाल कम पूछा जाता है कि "उस शक्ति पर नियंत्रण किसका है?" और उससे भी कठिन सवाल _"क्या शक्ति रखने वाला व्यक्ति खुद को भी जवाबदेह मानता है?"
शास्त्री जी की विरासत का महत्व केवल उनकी सादगी में नहीं है, बल्कि इस विचार में है कि "सार्वजनिक पद सुविधा से पहले जिम्मेदारी है।"
आज असली संकट सुविधाओं का नहीं, सीमाओं का है। हमारे पास साधन पहले से अधिक हैं, लेकिन क्या हमें अपनी सीमाओं का बोध है? कितना बोलना है, कितना खर्च करना है, कितना दिखाना है, कितना अधिकार लेना है और सबसे महत्वपूर्ण, कब रुक जाना है, यह भी आत्मसंयम है।
डिजिटल साक्षरता नहीं, डिजिटल संयम
एक समाज की परिपक्वता केवल उसकी आर्थिक या तकनीकी प्रगति से नहीं मापी जाती। यह भी देखना पड़ता है कि उसके नागरिक अपनी शक्ति, स्वतंत्रता और अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह करते हैं।
मोबाइल ने हमें आवाज दी, लेकिन क्या विवेक भी दिया? आज हर हाथ में एक ऐसा उपकरण है जो व्यक्ति को अपनी बात लाखों लोगों तक पहुँचाने की क्षमता देता है। एक पोस्ट कुछ ही क्षणों में फैल सकती है, एक वीडियो किसी की छवि बिगाड़ सकता है, और गुस्से में लिखा एक वाक्य डिजिटल दुनिया में हमेशा के लिए दर्ज हो सकता है।
"आज हमें केवल 'डिजिटल साक्षरता' की जरूरत नहीं है, हमें 'डिजिटल संयम' की भी जरूरत है। हमें यह सीखना होगा कि क्या पोस्ट करना है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है यह सीखना कि "क्या पोस्ट नहीं करना है।"
गांधी का आत्मसंयम आज के डिजिटल युग में पूछेगा -"क्या हर विचार को सार्वजनिक करना जरूरी है?"
और शास्त्री की सादगी पूछेगी- "क्या हर उपलब्ध मंच का इस्तेमाल स्वयं को दिखाने के लिए करना जरूरी है?"
2 अक्टूबर को एक प्रयोग कीजिए
इस बार श्रद्धांजलि देते हुए एक छोटा-सा प्रयोग किया जा सकता है। कुछ मिनट के लिए दूसरों की आलोचना रोकिए और खुद से पूछिए:
क्या मेरे शब्द मेरे चरित्र को दिखाते हैं?
क्या मेरी निजी जिंदगी और सार्वजनिक छवि में बहुत अंतर है?
क्या मैं अधिकार मांगते समय अपनी जिम्मेदारी याद रखता हूँ?
क्या मैं असहमति को दुश्मनी समझने लगा हूँ?
और सबसे असुविधाजनक सवाल "अगर मुझे कोई देख नहीं रहा हो, तो मैं वास्तव में कैसा इंसान हूँ?"
चरित्र की सबसे बड़ी परीक्षा वहीं होती है जहाँ कोई कैमरा नहीं होता, जहाँ कोई प्रशंसा, पुरस्कार या तालियाँ नहीं होतीं। वहीं व्यक्ति और उसके दिखावे के बीच का अंतर समाप्त होता है।
देश बदलने से पहले नागरिक कितना बदले?
हम अक्सर कहते हैं कि व्यवस्था बदलनी चाहिए, राजनीति बदलनी चाहिए, देश बदलना चाहिए। लेकिन हर परिवर्तन की सबसे छोटी इकाई "व्यक्ति" है।
अगर व्यक्ति सुविधा के लिए झूठ बोलता है, तो ईमानदार व्यवस्था की मांग कितनी प्रभावी होगी? अगर व्यक्ति अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकता, तो समाज में सहिष्णुता कैसे मजबूत होगी? लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है, यह एक नागरिक संस्कृति भी है।
शायद स्वराज का असली अर्थ यही है- हमने राजनीतिक स्वतंत्रता तो हासिल कर ली, लेकिन क्या हमने अपने भीतर के आवेगों से स्वतंत्रता हासिल की? क्या हम अपने क्रोध, अपनी इच्छाओं और दिखावे के दबाव से मुक्त हैं?
यहाँ गांधी और शास्त्री की प्रासंगिकता फिर सामने आती है। स्वतंत्रता के साथ आत्मअनुशासन जरूरी है, क्योंकि जो व्यक्ति खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह अपनी शक्ति का जिम्मेदार उपयोग नहीं कर पाएगा।
अब तस्वीरों से आगे बढ़ने का समय है। 2 अक्टूबर को गांधी और शास्त्री की तस्वीरों पर फूल चढ़ेंगे। यह परंपरा बनी रहनी चाहिए। लेकिन इस बार उन तस्वीरों के सामने खड़े होकर एक मिनट के लिए खुद को भी देखना चाहिए। राष्ट्र केवल संसद, सरकार और सीमाओं से नहीं बनता; राष्ट्र करोड़ों नागरिकों के चरित्र से बनता है।
श्रद्धांजलि के साथ आज खुद से यह सवाल माँगना चाहिए कि" हम उनके मूल्यों की प्रशंसा तो करते हैं, लेकिन क्या उन्हें अपने जीवन में उतारने की कीमत चुकाने को तैयार हैं?"
महान व्यक्तियों को याद करना इतिहास है, उनके मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारना वर्तमान की जिम्मेदारी है।
और अंततः सवाल गांधी या शास्त्री से नहीं है, सवाल हमसे है कि क्या हम दुनिया और व्यवस्था को बदलने की इतनी जल्दी में हैं कि खुद पर नियंत्रण करना ही भूल गए हैं?
यही वह सवाल है… जो कोई नहीं पूछता।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं
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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
