76 दिनों तक मनाया जाता है पर्व : बस्तर दशहरे का इतिहास…न रामलीला, न रावण वध, न तीर-कमान

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा जिसे देखने के लिए दुनियाभर से लोग पहुंचे है. राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू भी बस्तर पहुंच चुकी है और गवाह बनेंगी इस ऐतिहासिक क्षण की…जहां महामहीम कई कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे और कई विकास कार्यों की घोषणा भी कर सकती हैं बात अगर बस्तर दशहरा की करें तो भारत के विभिन्न राज्यों में रावण का पुतला दहन के बाद त्योहार का समापन हो जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में ऐसे नहीं होता बल्कि यहां दुनिया का सबसे लंबा दशहरा उत्सव चलता है तीन महीनों तक मनाया जाता है दशहरा.
76 दिनों तक मनाया जाता है दशहरा
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में 76 दिनों तक दशहरे का पर्व मनाया जाता है.खास बात ये है कि बस्तर में दशहरा भगवान राम की नहीं, यहां की आराध्य देवी दंतेश्वरी की विजयगाथा है और बस्तर का यह दशहरा उत्सव पूरे 76 दिन चलता है.
जानकारी के लिए बतादेंकि बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें हर समुदाय की भूमिका तय है. रथ बनाने वाले एक गांव के हैं, रस्सी लाने वाले दूसरे के, रथ खींचने वाले लोग तीसरे के, सारा आयोजन बिना किसी बाधा के समाप्त होने की कामना के साथ नौ दिनों तक गड्ढे में बैठ कर प्रार्थना करने वाले जोगी चौथे गांव के. रथ की लकड़ी एक गांव से आती है, कारीगर दूसरे गांव के, रस्सी तीसरे इलाक़े की देन है और विजय रथ खींचने का अधिकार किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों के पास है.

यहाँ रावण नहीं मारा जाता
बस्तर दशहरा की अपनी विशिष्ट पहचान है। दशहरे का वैभव ही कुछ ऐसा है कि सबको आकर्षित करता है। असत्य पर सत्य के विजय के प्रतीक, महापर्व दशहरे को पूरे देश में राम का रावण से युद्ध में विजय के रूप में विजयादशमी के दिन मनाया जाता है, किन्तु बस्तर दशहरा देश का ही नहीं, वरन् पूरे विश्व का अनूठा महापर्व है, जो असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक तो है, मगर बस्तर दशहरा में रावण नहीं मारा जाता, रामायण से इसका कोई संबंध नहीं, अपितु बस्तर की आराध्या देवी माँ दन्तेश्वरी सहित अनेक देवी-देवताओं की 75 दिनों तक पूजा-अर्चना होती है

600 साल पुराना इतिहास
बस्तर दशहरा का इतिहास लगभग 600 से 700 साल पुराना है और यह दुनिया का सबसे लंबा (लगभग 75 से 76 दिन तक चलने वाला) अनूठा पर्व है .
राजा पुरुषोत्तम देव: बस्तर दशहरे की शुरुआत 15वीं शताब्दी (लगभग 1408 ईस्वी) में बस्तर के काकतीय/चालुक्य वंश के चौथे राजा पुरुषोत्तम देव के शासनकाल में हुई थी मान्यता है कि लगभग 600 साल पहले चालुक्य वंश के राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथपुरी की यात्रा पर निकले. मुरिया, भतरा, गोंड, धाकड़, माहरा समेत कई जातियों के मुखिया उनके साथ चले. राजा खुद पैदल चले, किसी सवारी पर नहीं बैठे.
कहा जाता है कि पुरी के राजा ने उन्हें 16 पहिए का रथ भेंट किया, लौटकर राजा ने रथ बांट दिया. चार पहिए भगवान जगन्नाथ को और 12 देवी दंतेश्वरी को अर्पित हुए.तब से बस्तर के दशहरे में देवी का छत्र रथ पर रखा जाता है और रथ की परिक्रमा होती है.

हरेली अमावस्या पर शुरू होता है काम
मान्यता है कि हर साल हरेली अमावस्या कीसुबह जगदलपुर में दंतेश्वरी मंदिर के सामने जंगल से लाइ गई लकड़ी का बड़ा कुंदा रखा जाता है इसे ठुरलू खोटला कहते हैं रथ बनाने के औजारों के साथ इसकी पूजा होती है यही पाठ जात्रा दशहरा का पहला कदम है इसके बाद रथ बनना शुरू होता है. और फिर दस दिनों तक रथा का काम चलता है.

पितृमोक्ष अमावस्या से रथ बनता है
छत्तीसगढ़ का विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा...एक ऐसा पर्व, जिसकी शुरुआत रावण दहन से नहीं, बल्कि आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं से होती है। हरियाली अमावस्या पर निभाई जाने वाली ‘पाठ जात्रा’ से शुरू होता है इस ऐतिहासिक पर्व का सफर। मां दंतेश्वरी की आराधना, लकड़ी के विशाल कुंदे की पूजा और कीलों को ठोककर परंपरा के निर्विघ्न निर्वहन की कामना... आखिर क्या है ‘टुरलु खोटला’ का रहस्य? और क्यों बस्तर दशहरा में रथ निर्माण से पहले की जाती है विशेष पूजा? आइए, जानते हैं बस्तर की उस अनूठी सांस्कृतिक विरासत के बारे में, जो आज भी जनजातीय आस्था और परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।
76 दिनों तक चलती हैं कई रस्म
बस्तर दशहरा की खासबातये है कि 76 दिनों तक हर दिनों कोई ना कोई आदिवासी पारंपरिक रस्म चलती रहती है जिसका पालन आदिवासी समुदाय के लोग करते हैं.पुलिस के जवान रथ पर विराजी देवी दंतेश्वरी को सशस्त्र सलामी देते हैं. महिलाएं रथ की नज़र उतारती हैं और पुष्प वर्षा करती हैं. अष्टमी की आधी रात 'निशा जात्रा' की परंपरा होती है. दंतेश्वरी मंदिर से देवी की डोली निकलकर निशा-जात्रा मंदिर पहुंचती है, जो साल में सिर्फ़ एक बार खुलता है.

विजयदशमी पर आठ पहियों वाला रथा
विजयादशमी पर आठ पहियों वाला विजय रथ निकलता है. परिक्रमा के बाद देर रात रथ को 'चुरा' लिया जाता है और कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा दिया जाता है. यह 'भीतर रैनी' की रस्म है. इस दौरान कुम्हड़ाकोट में ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समेत कई इलाकों से तीन हज़ार से ज़्यादा देवी-देवताओं को लाया जाता है. अगले दिन राज परिवार के प्रतिनिधि नए अन्न का भोग लगाकर जनता के साथ नवाखानी मनाते हैं, फिर रथ लौटता है.

बस्तर दशहरा और मुरिया दरबार में गरिमामयी उपस्थिति
बताया जाता है कि मुरिया दरबार की शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई थी. रियासत काल में आदिवासियों की पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था- मांझी, मुखिया, चालकी और नाईक अपने-अपने इलाक़ों की समस्याएँ सीधे राजा के सामने रखते थे. ऐतिहासिक बस्तर दशहरा और मुरिया दरबार से जुड़े कार्यक्रम विशेष महत्व रखते हैं। बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं, मां दंतेश्वरी के प्रति आस्था और जनजातीय संस्कृति के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है। यह पर्व सामान्य दशहरे से अलग है और बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
वहीं, मुरिया दरबार जनजातीय समाज की परंपराओं, जनभागीदारी और क्षेत्रीय मुद्दों को सामने रखने वाला महत्वपूर्ण आयोजन है। राष्ट्रपति की उपस्थिति से बस्तर की गौरवशाली परंपराओं और जनजातीय विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
मुरिया दरबार पर होता दशहरे का समापन
मुरिया दरबार के बाद बाहर से आए देवी-देवताओं को सम्मान के साथ विदा किया जाता है. दंतेवाड़ा से आईं मावली माता की डोली और देवी दंतेश्वरी का छत्र, सशस्त्र सलामी के बीच शोभायात्रा के साथ लौटते हैं. दशहरा बीत जाता है. रथ लौट जाता है, देवी अपने धाम चली जाती हैं और दूर-दराज़ के गांवों से आए लोग घर लौटने लगते हैं. लेकिन अगले साल फिर जंगल से लकड़ी आएगी, कारीगर औज़ार निकालेंगे, रस्सियां तैयार होंगी और हज़ारों हाथ एक बार फिर रथ को खींचने के लिए जुटेंगे. पीहू शायद तब तक एक कक्षा और आगे बढ़ चुकी होंगी, लेकिन काछिन देवी बनने पर वह शायद फिर वही कहेंगी कि उस वक़्त वह पीहू नहीं रहती.

नीलम अहिरवार
17 साल से टीवी और डिजिटल की दुनिया में सक्रिय। एंटरटेनमेंट, करंट अफेयर्स और पब्लिक कनेक्ट खबरों की धुरंधर। बॉलीवुड की हरकतों को दुनिया तक पहुंचाने में खास दिलचस्पी।
