रिपोलिंग से पहले जहांगीर ने छोड़ा चुनावी मैदान : फलता की सियासत फिर सुर्खियों में, भाजपा के निशाने पर आई टीएमसी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के फलता क्षेत्र की सियासत अचानक फिर सुर्खियों में आ गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के उम्मीदवार जहांगीर खान ने चुनावी मैदान से हटने का फैसला कर राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। उन्होंने ऐलान किया कि अब वह चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रहेंगे। यह घोषणा ऐसे समय में आई जब चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरण में था, जिससे राजनीतिक समीकरण और भी उलझ गए हैं।
जहांगीर खान के हटने के बाद विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने टीएमसी पर तीखा हमला बोला है। बंगाल बीजेपी नेताओं ने दावा किया कि यह फैसला टीएमसी की कमजोरी और अंदरूनी दबाव को दर्शाता है। बंगाल बीजेपी प्रमुख समिक भट्टाचार्य ने तंज कसते हुए कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान टीएमसी नेतृत्व की अनुपस्थिति सवाल खड़े करती है और जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ कमजोर दिख रही है।
टीएमसी खेमे ने आरोपों को बताया राजनीतिक साजिश
वहीं, राज्य के वरिष्ठ राजनीतिक हलकों में बयानबाजी और भी तेज हो गई है। बीजेपी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र में चुनावी गतिविधियां पहले जैसी सक्रिय नहीं दिख रहीं। दूसरी ओर, टीएमसी खेमे ने इस तरह के आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया है और कहा है कि पार्टी पूरी मजबूती से चुनाव मैदान में है।
फलता क्षेत्र, जो डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, लंबे समय से टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। पिछले लगभग 15 वर्षों से यहां पार्टी का प्रभाव कायम रहा है, लेकिन इस बार चुनावी माहौल पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
जहांगीर के इस बयान पर बहस तेज
इसी बीच चुनावी माहौल को “सिनेमा स्टाइल” चर्चा ने और गर्म कर दिया है। कुछ दिनों पहले एक जनसभा में जहांगीर खान ने खुद को “पुष्पराज” बताते हुए कहा था कि “अगर तुम सिंघम हो, तो मैं पुष्पा हूं, झुकेगा नहीं।” इस बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई। बीजेपी नेताओं ने इसी बयान को लेकर पलटवार करते हुए सवाल उठाया कि “पुष्पा कहां है?”
सख्ती के बाद हाई-प्रोफाइल मुकाबले में बदला क्षेत्र
चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पर्यवेक्षक और प्रशासनिक सख्ती के बीच यह पूरा क्षेत्र हाई-प्रोफाइल मुकाबले में बदल गया है। उत्तर प्रदेश के आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा को पर्यवेक्षक बनाए जाने के बाद स्थिति पर और सख्त निगरानी रखी जा रही है।
कुल मिलाकर, फलता की यह सीट अब केवल चुनावी क्षेत्र नहीं बल्कि एक राजनीतिक प्रतीक बन चुकी है, जहां बयानबाजी, रणनीति और आरोप-प्रत्यारोप ने माहौल को बेहद गर्म कर दिया है। आने वाले नतीजे यह तय करेंगे कि यह सियासी टकराव किस दिशा में जाता है।
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