दुर्गाबाई की ‘आजादी’ की कहानी : ‘राजा हरिश्चंद्र’ के दौर में महिलाओं के लिए नहीं था पर्दा आसान

भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर की बात करें तो उस समय फिल्मों में महिलाओं का काम करना आसान नहीं था। समाज में सिनेमा को लेकर कई तरह की धारणाएं थीं और महिलाओं का पर्दे पर आना भी असामान्य माना जाता था। ऐसे दौर में एक महिला ने आगे बढ़कर कैमरे का सामना किया और भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया—दुर्गाबाई कामत।
कहानी की शुरुआत थिएटर से हुई
दुर्गाबाई कामत की कहानी सिनेमा से पहले थिएटर से शुरू होती है। उस दौर में थिएटर महिलाओं के लिए सिनेमा की तुलना में थोड़ा ज्यादा स्वीकार्य माध्यम था। दुर्गाबाई ने इसी मंच से अभिनय की दुनिया में कदम रखा और आगे चलकर फिल्मों का रुख किया।
जब महिलाओं के लिए फिल्मों में काम करना था मुश्किल
दादासाहेब फाल्के जब भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बना रहे थे, तब महिला कलाकारों का फिल्मों में काम करना सामाजिक रूप से आसान नहीं था। यही वजह थी कि फिल्म में महिला का किरदार भी एक पुरुष कलाकार ने निभाया था।
लेकिन कुछ समय बाद परिस्थितियां बदलीं और महिलाओं ने भी फिल्मों में अभिनय करना शुरू किया। इसी बदलाव में दुर्गाबाई कामत का नाम बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
‘मोहिनी भस्मासुर’ में बनीं ऐतिहासिक चेहरा
दुर्गाबाई कामत ने दादासाहेब फाल्के की फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में काम किया। उनकी बेटी कमलाबाई गोखले ने भी इस फिल्म में अभिनय किया था। इस फिल्म को भारतीय सिनेमा के इतिहास में इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि इसमें महिला कलाकारों की मौजूदगी ने आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता खोला।
दुर्गाबाई ने बदली पर्दे पर महिलाओं की तस्वीर
दुर्गाबाई का फिल्मी सफर सिर्फ एक अभिनेत्री के तौर पर महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि यह उस दौर की सामाजिक सोच को चुनौती देने वाली कहानी भी थी। जब महिलाओं के लिए कैमरे के सामने आना बड़ी बात माना जाता था, तब उन्होंने अभिनय को अपना पेशा बनाया और आने वाली महिला कलाकारों के लिए एक रास्ता तैयार किया।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हुआ नाम
आज भारतीय सिनेमा में महिला कलाकारों की मजबूत मौजूदगी दिखाई देती है। लेकिन इस सफर की शुरुआत करने वाली शुरुआती महिलाओं को याद करना भी उतना ही जरूरी है। दुर्गाबाई कामत का नाम इसी इतिहास का अहम हिस्सा है।
उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री के फिल्मी सफर की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की ‘आजादी’ की कहानी है—जब एक महिला ने समाज की बंदिशों से आगे बढ़कर कैमरे के सामने खड़े होने का फैसला किया और भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपनी जगह बना ली।
पलक गीते
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
