अमित शाह मानहानि केस में राहुल को बड़ी राहत : साक्ष्यों के आभाव में सुल्तानपुर कोर्ट ने किया बारी, 2018 की आपित्तजनक टिप्पणी से जुड़ा था मामला

सुल्तानपुर। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह मानहानि मामले में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बड़ी राहत मिली है। शाह पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में उत्तरप्रदेश की सुल्तानपुर कोर्ट ने राहुल को बरी कर दिया है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता एमपी-एमएलए अदालत में ही मौजूद रहे।
सुबह 11ः12 बजे अदालत पहुंचे राहुल गांधी
बता दें कि राहुल गांधी सुबह करीब 11ः12 बजे सुल्तानपुर की अदालत पहुंचे। उनकी पेशी को देखते हुए दीवानी न्यायालय परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। अदालत परिसर में लोगों की आवाजाही नियंत्रित की गई और फरियादियों को बाहर कतार में खड़ा किया गया। सुरक्षा कारणों से राहुल गांधी के अदालत कक्ष में पहुंचने के बाद दरवाजा बंद कर दिया गया।
स्पेशल मजिस्ट्रेट शुभम वर्मा की अदालत ने मामले में सुनवाई करते हुए राहुल गांधी को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है। फैसले से पहले निजी बंधपत्र और जमानतनामा दाखिल करने की प्रक्रिया भी पूरी की गई। इसके बाद अदालत ने उन्हें मामले में बरी कर दिया।
2018 की टिप्पणी से जुड़ा है पूरा मामला
यह मामला मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान बेंगलुरु में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी की कथित टिप्पणी से संबंधित है। आरोप था कि उन्होंने उस समय भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ मानहानिकारक बयान दिया था।
इस मामले में भाजपा नेता और सुल्तानपुर जिला सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष विजय मिश्रा ने 4 अगस्त 2018 को शिकायत दर्ज कराई थी। शुरुआती सुनवाई सिविल कोर्ट में हुई, जिसके बाद मामला एमपी-एमएलए अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया।
2023 में जारी हुआ था समन
अदालत ने 27 नवंबर 2023 को राहुल गांधी को समन जारी किया था। इसके बाद 20 फरवरी 2024 को वह पहली बार व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश हुए थे। उस समय उन्हें 25-25 हजार रुपये के दो मुचलकों पर जमानत मिली थी। राहुल गांधी ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करते हुए इसे सत्ता पक्ष की साजिश बताया था।
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से राहुल गांधी की आवाज का नमूना लेने की मांग भी की गई थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद सेशन कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस मांग को स्वीकार नहीं किया।
प्रफुल्ल तिवारी
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