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समय का सच.. : दौड़ती हुई अर्थव्यवस्था और हांफती हुई जेब ..

admin

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Sep 07, 2026
01:06 PM
दौड़ती हुई अर्थव्यवस्था और हांफती हुई जेब ..

-UMEESH GUPTA

  • विकास की रफ्तार तेज है, लेकिन आम आदमी की जेब कितनी तेज चल रही है?

  • 7.8 प्रतिशत GDP के उत्सव के बीच भारत के भविष्य का असली सवाल है "क्या आर्थिक विकास रोजगार, आय और जीवन की गुणवत्ता में भी बदल रहा है?"

भारत की अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर दुनिया को चौंकाया है। 31 अगस्त को जारी आंकड़ों में अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 प्रतिशत दर्ज हुई। यह अनुमान से बेहतर प्रदर्शन है। वास्तविक GVA भी 8.2 प्रतिशत बढ़ा। विनिर्माण, सेवाओं और निवेश ने अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। यह निश्चित रूप से अच्छी खबर है। लेकिन “समय का सच” का काम केवल अच्छी खबर पर तालियां बजाना नहीं है। उसका काम उस खबर के भीतर छिपे अगले सवाल को खोजना है।

और आज वह सवाल है_

"भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन क्या भारतीय परिवारों की आर्थिक जिंदगी भी उसी गति से बेहतर हो रही है?"

यही अंतर आने वाले भारत की दिशा तय करेगा। GDP का आंकड़ा महत्वपूर्ण है, लेकिन कहानी पूरी नहीं है ...GDP बताता है कि देश ने एक निश्चित अवधि में कितना आर्थिक उत्पादन किया। यह आर्थिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेतक है, लेकिन नागरिक के जीवन की पूरी तस्वीर नहीं। किसी देश की GDP बढ़ सकती है और उसी समय उसके सामने यह प्रश्न भी खड़ा रह सकता है कि_

  • नई नौकरियां कितनी बनीं?

  • वास्तविक मजदूरी कितनी बढ़ी?

  • युवा कितनी जल्दी रोजगार पा रहे हैं?

  • परिवार अपनी आय का कितना हिस्सा बचा पा रहे हैं?

  • छोटे कारोबार की स्थिति क्या है?

  • शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च कितना बढ़ रहा है?

  • घर खरीदना अगली पीढ़ी के लिए आसान हो रहा है या कठिन?

  • और सबसे महत्वपूर्ण _"विकास का लाभ समाज के कितने हिस्से तक पहुंच रहा है?"

यहीं से 7.8 प्रतिशत की कहानी का दूसरा अध्याय शुरू होता है। अर्थव्यवस्था में सकल स्थिर पूंजी निर्माण यानी निवेश की वृद्धि पहली तिमाही में 11.9 प्रतिशत रही, जबकि निजी उपभोग व्यय की वास्तविक वृद्धि 7.1 प्रतिशत रही। इसका अर्थ यह नहीं कि उपभोग कमजोर है; बल्कि यह संकेत जरूर मिलता है कि इस समय विकास का एक बड़ा इंजन निवेश है। अब चुनौती यह है कि आज का निवेश कल की "उत्पादक क्षमता, रोजगार और आय" में कितना बदलता है।

असली परीक्षा रोजगार की है, भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। जुलाई 2026 के सरकारी PLFS आंकड़ों में 15 वर्ष और उससे ऊपर की आबादी के लिए बेरोजगारी दर 5.1 प्रतिशत रही। श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत और worker population ratio 52.5 प्रतिशत रहा। महिला श्रम बल भागीदारी भी बढ़कर 34.4 प्रतिशत हुई।

ये आंकड़े सुधार का संकेत देते हैं। लेकिन भारत के लिए केवल बेरोजगारी दर कम होना पर्याप्त नहीं है।

भारत को अच्छी, उत्पादक और पर्याप्त आय वाली नौकरियां चाहिए। युवा डिग्री लेकर केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि उच्च उत्पादकता वाली अर्थव्यवस्था का भागीदार बनना चाहता है। अगर अर्थव्यवस्था 7-8 प्रतिशत की गति से बढ़ती रहे लेकिन लाखों युवा अपनी शिक्षा के अनुरूप रोजगार न पा सकें, तो आर्थिक विकास और सामाजिक आकांक्षा के बीच दूरी बढ़ सकती है और यही दूरी भविष्य में असंतोष का सबसे बड़ा कारण बन सकती है। आज का युवा केवल नौकरी नहीं, भविष्य मांग रहा है, भारत की नई पीढ़ी अपने माता-पिता की पीढ़ी से अलग आर्थिक दुनिया में प्रवेश कर रही है।

पहले प्रश्न था_

“नौकरी मिलेगी या नहीं?”

आज प्रश्न बदलकर हो रहा है_

“नौकरी मिलेगी, तो क्या उससे जीवन बनाया जा सकेगा?”

युवा केवल वेतन नहीं देखता। वह आवास की कीमत देखता है। शिक्षा का खर्च देखता है। स्वास्थ्य की लागत देखता है।

परिवार बनाने की आर्थिक क्षमता देखता है। बचत और निवेश की संभावना देखता है और यह भी देखता है कि दस साल बाद उसकी आर्थिक स्थिति आज से कितनी बेहतर होगी। इसलिए आने वाले वर्षों में भारत की सफलता का पैमाना केवल GDP growth नहीं होगा।

GDP + रोजगार + वास्तविक आय + उत्पादकता + सामाजिक सुरक्षा = वास्तविक आर्थिक प्रगति

यही समीकरण भारत की अगली पीढ़ी का भविष्य तय करेगा। भारत की आर्थिक कहानी के सामने बाहरी जोखिम भी कम नहीं हैं। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज उछाल सीधे आयात बिल, परिवहन लागत, उत्पादन लागत और अंततः घरेलू महंगाई पर दबाव डाल सकता है। हाल के महीनों में भू-राजनीतिक तनाव ने इस जोखिम को फिर सामने ला दिया है यानी भारत के सामने एक कठिन संतुलन है..

  • तेज विकास भी चाहिए और महंगाई नियंत्रण भी।

  • निवेश भी चाहिए और उपभोग की ताकत भी।

  • बुनियादी ढांचा भी चाहिए और रोजगार भी।

  • वैश्विक बाजार भी चाहिए और बाहरी झटकों से सुरक्षा भी।

आने वाले दशक में आर्थिक नीति की असली परीक्षा इसी संतुलन में होगी। अगला सवाल यह है कि क्या 7.8 प्रतिशत की वृद्धि आगे भी कायम रहेगी?

इसका उत्तर निश्चित रूप से कोई नहीं दे सकता। लेकिन दिशा को लेकर कुछ बातें स्पष्ट हैं। यदि भारत निवेश की वर्तमान गति को बनाए रखता है, विनिर्माण क्षमता बढ़ाता है, निर्यात को मजबूत करता है, ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाता है और रोजगार-प्रधान क्षेत्रों को गति देता है, तो उच्च विकास दर बनाए रखने की संभावना मजबूत होगी। लेकिन यदि विकास का बड़ा हिस्सा पूंजी-प्रधान क्षेत्रों में सीमित रहा और रोजगार तथा घरेलू आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी, तो GDP और आम आदमी के अनुभव के बीच अंतर बना रह सकता है यानी अगली चुनौती “Growth” से “Broad-based Growth” की है। भारत को केवल तेज बढ़ना नहीं है अपितु ऐसा बढ़ना है कि अधिक से अधिक भारतीय उस वृद्धि को अपने जीवन में महसूस कर सकें।

आज भारत जिस आर्थिक ढांचे का निर्माण कर रहा है, उसका प्रभाव केवल आज की आबादी पर नहीं पड़ेगा, 2047 का भारत आज के निवेश से बनेगा। आज जो सड़कें, रेल, बंदरगाह, डिजिटल नेटवर्क, बिजली व्यवस्था, विनिर्माण क्षमता और शिक्षा संस्थान बन रहे हैं, वे अगली पीढ़ी की उत्पादकता तय करेंगे। लेकिन infrastructure अकेला पर्याप्त नहीं है।

अगर आज का भारत केवल भौतिक बुनियादी ढांचा खड़ा करता है लेकिन मानव पूंजी को समान गति नहीं देता, तो आर्थिक विकास की क्षमता सीमित हो जाएगी और यदि भारत अपने युवाओं को उच्च कौशल, आधुनिक विनिर्माण, अनुसंधान, उद्यमिता और वैश्विक सेवा क्षेत्र से जोड़ देता है, तो यही युवा भारत की सबसे बड़ी आर्थिक पूंजी बन सकता है। आज भारत में आर्थिक बदलाव को तीन पीढ़ियों के संदर्भ में देखना जरूरी है।

•पहली पीढ़ी ने अभाव से विकास की यात्रा देखी।

* दूसरी पीढ़ी ने उदारीकरण, निजी क्षेत्र और वैश्वीकरण का लाभ उठाया।

* तीसरी पीढ़ी _आज का युवा, एक ऐसे भारत में प्रवेश कर रही है जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ रहा है।

लेकिन इस तीसरी पीढ़ी की अपेक्षाएं भी सबसे बड़ी हैं।

वह केवल यह नहीं पूछेगी कि

“भारत कितना बड़ा हुआ?”

वह पूछेगी

“मेरी जिंदगी कितनी बेहतर हुई?”

और यही सवाल भविष्य की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता तीनों को प्रभावित करेगा।

भारत को अब GDP-centric growth से आगे बढ़कर people-centric growth की तरफ जाना होगा।

इसका मतलब है_

  • निवेश हो, लेकिन रोजगार पैदा करने वाला निवेश हो।• • •विनिर्माण बढ़े, लेकिन उसकी supply chain में छोटे और मध्यम उद्यम भी मजबूत हों।

  • तकनीक आए, लेकिन वह रोजगार को केवल विस्थापित न करे,नए अवसर भी पैदा करे।

  • शहर विकसित हों, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था पीछे न छूटे।

  • महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़े, लेकिन उनके लिए सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार भी उपलब्ध हों।

  • और सबसे महत्वपूर्ण, आर्थिक विकास का अंतिम लक्ष्य केवल राष्ट्रीय आय बढ़ाना नहीं, बल्कि नागरिक की आर्थिक क्षमता बढ़ाना होना चाहिए।

आज की परिस्थितियों में निराश होने का कोई कारण नहीं है। भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार है। युवा कार्यबल है डिजिटल आधारभूत ढांचा है। विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की संभावना है। बुनियादी ढांचे में निवेश हो रहा है और दुनिया की supply chains में विविधीकरण भारत के लिए अवसर पैदा कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार भी अगस्त के अंत में रिकॉर्ड करीब 740.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो बाहरी झटकों से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। इसलिए तस्वीर एकतरफा नहीं है। भारत मजबूत भी है और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर भी खड़ा है।

यही इस समय का वास्तविक सच है।

7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि भारत के लिए गर्व का विषय है लेकिन इसे अंतिम मंजिल मान लेना भूल होगी। यह एक अवसर है, यह साबित करने का कि भारत तेज आर्थिक वृद्धि को रोजगार, आय, उत्पादकता और जीवन की बेहतर गुणवत्ता में बदल सकता है। आने वाले दस-पंद्रह वर्ष भारत के लिए निर्णायक हैं।

  • अगर आज का निवेश कल के रोजगार में बदलता है,

  • अगर युवा केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं बल्कि रोजगार पैदा करने वाला बनता है,

  • अगर महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ती है,

  • अगर ग्रामीण भारत की उत्पादकता बढ़ती है

  • और अगर विकास का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचता है, तो 7.8 प्रतिशत केवल एक आंकड़ा नहीं रहेगा। वह भारत के परिवर्तन की वास्तविक गति बन जाएगा

लेकिन यदि GDP के आंकड़े बढ़ते रहे और परिवार की आय, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा उसी गति से नहीं बढ़े, तो इतिहास हमसे एक असहज सवाल पूछेगा_

“देश की अर्थव्यवस्था तो बढ़ रही थी, लेकिन उस विकास में आम आदमी का हिस्सा कितना था?”और शायद “समय का सच” का आज का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यही है

की भारत को अब केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं बनना है।भारत को ऐसी बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, जिसमें अगली पीढ़ी अपने माता-पिता से बेहतर जीवन जीने का भरोसा कर सके क्योंकि किसी देश की असली समृद्धि उसके GDP में नहीं, उसके नागरिक के भविष्य के भरोसे में दिखाई देती है।

लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट" एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं

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एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।

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