समय का सच : “इंतजार में सिमटा युवा,-"नौकरी से पहले खत्म होती जवानी”

-UMEESH GUPTA
रोज़ सुबह लाखों हाथ अख़बार के पन्ने पलटते हैं। रोज़गार समाचार पर नज़र सबसे पहले जाती है। चाय ठंडी हो जाती है, लेकिन उम्मीद गर्म रहती है।शाम होते-होते वही उम्मीद मोबाइल स्क्रीन पर “नई भर्ती” खोजती है, और रात को वही युवा छत की तरफ देखते हुए सो जाता है इस भरोसे के साथ कि शायद अगला दिन उसका होगा।
लेकिन अगला दिन भी इंतज़ार लेकर आता है-
भर्ती का इंतज़ार,
परीक्षा का इंतज़ार,
रिज़ल्ट का इंतज़ार,
नियुक्ति पत्र का इंतज़ार,
और कभी-कभी अदालत के फ़ैसले का इंतज़ार।
यह किसी एक दिन, एक वर्ष या एक सरकार का इंतज़ार नहीं है। यह एक पूरी पीढ़ी का इंतज़ार है। भारत, जिसे दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है, जहाँ बार-बार कहा जाता है कि “युवा हमारी ताकत हैं”-
वहीं आज का युवा ताकत नहीं, प्रतीक्षा बन चुका है।
"देश का करोड़ों पढ़ा-लिखा युवा किसी नौकरी में नहीं,बल्कि एक अंतहीन प्रतीक्षा सूची में जी रहा है।"
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) और विभिन्न श्रम सर्वेक्षणों के आँकड़े लगातार यह संकेत देते रहे हैं कि युवाओं में बेरोज़गारी दर चिंताजनक स्तर पर बनी हुई है, विशेषकर 15–29 आयु वर्ग में। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, लेकिन अवसर उस अनुपात में नहीं बन पाते।यह केवल बेरोज़गारी नहीं है-यह व्यवस्था द्वारा युवाओं की उम्र को किस्तों में खर्च करने की प्रक्रिया है।
सुबह लाइब्रेरी में बैठा छात्र, किराए के कमरे में पढ़ती युवती, प्रतियोगी किताबों के बीच घुटते सपने, और अपनी जवानी के सबसे ऊर्जावान वर्ष तैयारी में खपा चुका एक थका हुआ अभ्यर्थी-इन सबके पास डिग्रियाँ हैं, मेहनत है, सपने हैं।
"नहीं है तो सिर्फ़ एक भरोसेमंद व्यवस्था।"
सरकारी दावे कहते हैं कि रोजगार बढ़ रहा है। लेकिन यह आँकड़ा उस इंजीनियर को क्या समझाएगा जो चाय की दुकान चला रहा है? उस परास्नातक को क्या संतोष देगा जो डेटा एंट्री के लिए कतार में खड़ा है? और उस शोधार्थी को क्या जवाब देगा जो चपरासी भर्ती का फॉर्म भरने को मजबूर है?
समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है। समस्या यह है कि उम्मीदें कहीं अधिक पैदा की जा रही हैं, अवसर उससे कहीं कम।
चुनावी मंचों पर लाखों रोजगार के वादे गूँजते हैं। बजट में अवसरों के दावे दर्ज होते हैं और ज़मीन पर तस्वीर अलग दिखाई देती है।
सरकारी विज्ञापन निकलते हैं।
लाखों आवेदन भरे जाते हैं।
फीस जमा होती है।
कोचिंग उद्योग फलता-फूलता है।
लेकिन भर्ती प्रक्रिया या तो वर्षों तक अटक जाती है, या फिर पेपर लीक, घोटालों और न्यायिक विवादों में उलझ जाती है।
हाल के वर्षों में विभिन्न भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में सामने आए घोटालों ने युवाओं के विश्वास को गहरी चोट पहुँचाई है। लाखों छात्रों की मेहनत कुछ लोगों के लालच की भेंट चढ़ जाती है।जो युवा पाँच-पाँच, दस-दस वर्षों तक तैयारी करते हैं, वे अपने जीवन का सबसे मूल्यवान समय इस उम्मीद में लगा देते हैं कि एक दिन उनका नाम मेरिट सूची में होगा। लेकिन जब परीक्षा की निष्पक्षता ही संदेह में आ जाए, तो मेहनत का मूल्य कौन तय करेगा?
"बेरोज़गारी अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही।
यह एक सामूहिक मानसिक थकान बन चुकी है।"
एक समय था जब नौकरी जीवन की शुरुआत होती थी।आज नौकरी की तैयारी ही पूरी जवानी खा रही है।पच्चीस वर्ष का युवा तीस की उम्र तक “अभ्यर्थी” बना रहता है। उसकी पहचान नाम से कम, रोल नंबर से अधिक हो गई है।रेलवे भर्तियाँ वर्षों तक लंबित रहती हैं। शिक्षक नियुक्तियाँ अदालतों में अटक जाती हैं। पुलिस भर्ती पर सवाल उठते हैं।
हर नया विवाद यही संदेश देता है-
"अब केवल मेहनत पर्याप्त नहीं, व्यवस्था से संघर्ष भी अनिवार्य है।'
देश में हर वर्ष लाखों डिग्रियाँ बाँटी जा रही हैं, डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, अवसर सिकुड़ रहे हैं—और इसी खाली जगह में जन्म ले रहा है - एक नया भारत_"हताश भारत"
"यह युवाओं की असफलता नहीं है। यह नीति निर्माण की असफलता है।"
क्योंकि जिस देश में रोजगार सृजन से अधिक ऊर्जा प्रचार और आयोजन पर खर्च हो, वहाँ नौकरी पोस्टरों में मिलती है, ज़मीन पर नहीं।सवाल यह नहीं कि युवाओं में प्रतिभा की कमी है। सवाल यह है कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं में युवा आखिर कहाँ हैं।
देश में एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, कॉरिडोर बन रहे हैं, डिजिटल अभियान चल रहे हैं—लेकिन क्या रोजगार सृजन को लेकर कोई ठोस, समयबद्ध राष्ट्रीय रणनीति दिखाई देती है?
"यह संकट केवल आर्थिक नहीं है। यह सामाजिक और मानसिक भी है।"
बेरोज़गारी परिवारों को तोड़ती है, आत्मविश्वास को कमजोर करती है, और युवाओं को अवसाद की ओर धकेलती है। कई प्रतिभाएँ प्रतियोगी परीक्षाओं की अंतहीन दौड़ में थककर अपने सपनों से समझौता कर लेती हैं। सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि नौकरी नहीं है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मेहनत करने वाले को भी भरोसा नहीं कि नौकरी उसे मिलेगी।
जब किसी राष्ट्र का युवा यह मानने लगे कि परिणाम योग्यता से नहीं, बल्कि सिफारिश, भ्रष्टाचार या संयोग से तय होंगे, तब उस राष्ट्र की नींव भीतर से कमजोर होने लगती है।
"हर युवा नौकरी नहीं माँग रहा। वह केवल निष्पक्ष अवसर चाहता है।"
आज आवश्यकता केवल रोजगार बढ़ाने की नहीं, बल्कि व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की है—पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, समयबद्ध परीक्षा कैलेंडर, और पेपर लीक जैसे अपराधों पर कठोर दंड ही इस विश्वास को पुनर्स्थापित कर सकते हैं।क्योंकि-
"किसी भी देश का भविष्य संसद भवनों में नहीं, उसके युवाओं के विश्वास में बनता है।" और आज वही विश्वास टूट रहा है।
जब कोई किसान अपनी ज़मीन गिरवी रखकर बेटे को पढ़ाता है, जब कोई माँ अपने गहने बेचकर बेटी को कोचिंग भेजती है, और वर्षों बाद भी वह बच्चा नौकरी नहीं, केवल अगली परीक्षा की तारीख़ पाता है,
"तब असफल युवा नहीं होता, असफल व्यवस्था होती है।"
राष्ट्र केवल सड़कों, पुलों और ऊँची इमारतों से महान नहीं बनते, "राष्ट्र तब महान बनते हैं जब उनका युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त हो।"
"आज भारत का युवा प्रतिभा से नहीं, प्रतीक्षा से पहचाना जा रहा है। "
"यह इंतज़ार करता भारत है -वही भारत जो विश्वगुरु बनने का सपना देखता है।"
याद रखिए,
जिस देश का युवा लगातार इंतज़ार करता है, वह पहले निराश होता है, फिर उदासीन होता है, और अंततः व्यवस्था से विश्वास खो देता है और विश्वास खोता हुआ युवा किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा संकट होता है, वह "क्रांतिबीज" बन जाता है।
इंतज़ार की भी एक उम्र होती है।
यह केवल युवाओं का संकट नहीं, भारत के भविष्य की परीक्षा है।
"भारत" आज इसी चौराहे पर खड़ा है_ और यही " समय का सच" है ।
लेखक TV 27 News में 'कंसल्टिंग एडिटर एवं वाइस प्रेसिडेंट"
एवं " मीडिया प्रबंधन" में PhD शोधार्थी हैं,
admin
एक अनुभवी पत्रकार और लेखक, जो देश और दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों को सटीकता के साथ आप तक पहुँचाते हैं।
