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9-11 हमलों के बाद पाकिस्तान ने खेला था डबल गेम : इधर अमेरिका को साथ, उधर आतंकियों को दे रहा था पनाह, मौलाना ने दुनिया के सामने किया नंगा

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May 20, 2026
08:16 AM
इधर अमेरिका को साथ, उधर आतंकियों को दे रहा था पनाह, मौलाना ने दुनिया के सामने किया नंगा

नई दिल्ली। पाकिस्तान के एक मौलाना ने पाकिस्तान की विदेश नीति और आतंकवाद से जुड़े पुराने आरोपों को फिर से चर्चा में ला दिया है। पाकिस्तान की प्रमुख राजनीतिक-धार्मिक पार्टी जमीअत उलेमा-ए-इस्लाम के नेता मौलाना फजलुर रहमान ने स्वीकार किया है कि 9-11 हमलों के बाद पाकिस्तान ने एक ओर अमेरिका का साथ दिया, जबकि दूसरी ओर कुछ आतंकी समूहों को भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता रहा।

उन्होंने कहा कि उस समय पाकिस्तान सरकारें अफगानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व वाले युद्ध का हिस्सा बनीं, लेकिन साथ ही ऐसे तत्वों को भी बढ़ावा मिलता रहा जिन्हें बाद में क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण माना गया।

तालिबान और अफगान राजनीति पर टिप्पणी

मौलाना फजलुर रहमान ने अफगान तालिबान को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उनके अनुसार, पाकिस्तान की रणनीति लंबे समय तक अफगानिस्तान में एक “अनुकूल सरकार” स्थापित करने की रही। इसी सोच के तहत बुरहानुद्दीन रब्बानी की सरकार के खिलाफ तालिबान को समर्थन मिला। उन्होंने यह भी दावा किया कि समय के साथ वही ताकतें इतनी मजबूत हो गईं कि क्षेत्रीय राजनीति का संतुलन बदल गया और हालात पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर होते चले गए।

भारत के साथ बढ़ते संबंधों पर चिंता

अपने बयान में मौलाना ने यह भी आरोप लगाया कि वर्तमान में अफगान तालिबान भारत के साथ संबंध बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार, यह बदलाव पाकिस्तान की वर्षों पुरानी रणनीतिक योजना के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने चेतावनी दी कि अफगानिस्तान में बदलते समीकरण पाकिस्तान के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं और उसकी विदेश नीति प्रभावी परिणाम नहीं दे पा रही है।

पाकिस्तान की नीतियों पर फिर उठे सवाल

मौलाना फजलुर रहमान के इस बयान को पाकिस्तान की पिछली सरकारों की नीतियों की एक तरह की स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के दौरान पाकिस्तान की भूमिका अक्सर विरोधाभासी रही है-जहां एक तरफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग था, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय रणनीतिक हितों के चलते अलग रवैया भी अपनाया गया। उनका यह बयान पाकिस्तान की अफगान नीति, तालिबान से संबंध और क्षेत्रीय रणनीति पर एक बार फिर गंभीर बहस को जन्म दे रहा है।

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