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उज्जैन। उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में इस वर्ष गुड़ी पड़वा के पावन अवसर पर एक ऐतिहासिक परंपरा का भव्य पुनरुद्धार देखने को मिलेगा। 19 मार्च को मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज फहराया जाएगा, जो केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि लगभग 2000 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत का पुनर्जीवन भी है। माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत प्राचीन भारत के महान सम्राट सम्राट विक्रमादित्य के समय में हुई थी।
इस आयोजन को लगातार दूसरे वर्ष भी भव्य रूप में किया जा रहा है, जिसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है। उनके प्रयासों से विक्रम संवत और ब्रह्म ध्वज जैसी परंपराओं को फिर से जन-जन तक पहुंचाने की पहल की जा रही है।
केसरिया रंग का होता है विशेष ध्वज
विक्रमादित्य शोध संस्थान के निदेशक राम तिवारी के अनुसार ब्रह्म ध्वज शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक है। यह केसरिया रंग का विशेष ध्वज होता है, जिसमें दो पताकाएं दोनों ओर लगी रहती हैं। इसके मध्य में सूर्य का चिन्ह अंकित होता है, जो ऊर्जा, तेज और विश्व विजय का प्रतीक माना जाता है। महिदपुर स्थित अश्विनी शोध संस्थान में आज भी वे प्राचीन मुद्राएं सुरक्षित हैं, जो इस परंपरा की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती हैं।
पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था उज्जैन
इतिहास के अनुसार, विक्रमादित्य काल में उज्जैन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र था और इसे पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था। उस समय के सिक्कों पर बने चिन्ह उज्जैन के वैश्विक संपर्क और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाते हैं।
ध्वज की खास बात
विशेष बात यह भी है कि यह ध्वज लगभग 65 वर्षों तक पंडित सूर्यनारायण व्यास के परिवार द्वारा सुरक्षित रखा गया था। उसी से प्रेरणा लेकर आज के ब्रह्म ध्वज का निर्माण किया गया है, जो अब फिर से समाज में सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनकर स्थापित हो रहा है।
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