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भारत ने बदल दी कहानी : 54 साल बाद फिर चांद की ओर इंसान…! अंतरिक्ष इतिहास में जुड़ा नया अध्याय

54 साल बाद फिर चांद की ओर इंसान…! अंतरिक्ष इतिहास में जुड़ा नया अध्याय
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admin

Apr 02, 202601:49 PM

नासा का आर्टेमिस-2 मिशन आज 2 अप्रैल 2026 की सुबह करीब 3:54 बजे फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक उड़ान भर चुका है. यह बहुत ही खास और ऐतिहासिक पल है, क्योंकि करीब 54 साल बाद इंसान फिर से चांद की ओर जा रहा है यानी Apollo 17 mission के बाद, इंसान एक बार फिर चांद के करीब पहुंचने जा रहा है। इस ऐतिहासिक मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं-

कमांडर Reid Wiseman,

पायलट Victor Glover,

मिशन स्पेशलिस्ट Christina Koch

और कनाडा के Jeremy Hansen।

ये सभी अंतरिक्ष यात्री Orion spacecraft में सवार होकर चांद के चारों ओर चक्कर लगाएंगे और फिर सुरक्षित पृथ्वी पर लौटेंगे।

आर्टेमिस II क्यों है खास?

आर्टेमिस II इस पूरे कार्यक्रम का दूसरा और बेहद अहम मिशन है.

यही वो मिशन है जो इंसानों को एक बार फिर चांद की दिशा में लेकर जाएगा.

यह सीधे चांद पर लैंड नहीं करेगा

लेकिन चांद के आसपास उड़ान भरकर आगे के मिशनों की तैयारी करेगा

54 साल बाद फिर चांद की ओर क्यों?

-अपोलो कार्यक्रम 1972 में खत्म होने के बाद अमेरिका ने चांद पर जाने का सिलसिला रोक दिया था.

-उस वक्त राजनीति और बजट जैसे कारणों की वजह से फोकस बदलकर पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) पर आ गया. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं.

-वैज्ञानिकों को चांद पर पानी, खनिज और दूसरे अहम संसाधनों के संकेत मिले हैं,

-जो भविष्य की स्पेस इकोनॉमी के लिए बहुत जरूरी माने जा रहे हैं.

-इसी वजह से आर्टेमिस कार्यक्रम शुरू किया गया

चांद को मान लिया था बंजर और बेकार

भारत के किसी व्यक्ति ने भले ही चांद पर कदम न रखा हो, लेकिन चंद्रमा को लेकर मानवों की रुचि फिर से जगाने का बड़ा श्रेय भारत को जाता है.

1972 के ओपोलो मिशन के बाद चंद्रमा दुनिया के दिमाग से लगभग ओझल होने लगा था. उस दौर में चांद से लाए गए सैंपलों के आधार पर यह नतीजा निकाल लिया था कि चांद पूरी तरह सूखा, प्राचीन और भूगर्भीय रूप से मृत है. वहां न पानी है, न जीवन की कोई संभावना और न ही वहां पर फिर से जाने का कोई ठोस कारण. नतीजतन, दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों ने चांद से मुंह मोड़कर पृथ्वी की निचली कक्षा पार कर लिया

जो कभी दुनिया के लिए सिर्फ एक सूना पत्थर था… उसी चांद की तस्वीर भारत ने बदल दी!

चंद्रमा को लेकर दुनिया की उदासीनता उस वक्त टूटी, जब साल 2008 में ISRO का Chandrayaan-1 चांद की कक्षा में पहुंचा।

इस मिशन के साथ भेजे गए मून इम्पैक्ट प्रोब को जानबूझकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर क्रैश कराया गया… और यहीं से शुरू हुई एक बड़ी खोज।

भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना, जिसने चांद के साउथ पोल को इतनी गंभीरता से एक्सप्लोर किया।सबसे बड़ी बात ये रही कि इस मिशन ने चांद पर पानी के अणुओं के पुख्ता सबूत दुनिया के सामने रखे… जिसने पूरी अंतरिक्ष विज्ञान की दिशा ही बदल दी। इसके अलावा, चंद्रयान-1 के डेटा ने Helium-3 के विशाल भंडार के संकेत भी दिए—

एक ऐसा संसाधन, जिसे भविष्य में न्यूक्लियर फ्यूजन के ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

चंद्रयान की खोजों ने दिखाई राह

इसके 15 साल बाद, भारत ने चंद्रयान-3 के जरिए नया इतिहास रचा. अगस्त 2023 में विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के साउथ पोल पर सॉफ्ट लैंडिंग की।

ऐसा पहले कोई भी देश नहीं कर पाया था. उसके साथ गए प्रज्ञान रोवर ने अहम खोजें कीं.इसके स्पेक्ट्रोमीटर ने चंद्रमा की सतह पर मौजूद तत्वों की पहचान की।

इसमें एल्यूमीनियम, कैल्शियम, आयरन, टाइटेनियम, क्रोमियम और सल्फर की पुष्टि हुई. इनमें सल्फर की मौजूदगी सबसे अहम थी.इसने इस सोच को बदला कि चंद्रमा किस तरह बना और विकसित हुई

वहीं विक्रम लैंडर पर लगे ChaSTE के जरिए मापे गए चंद्रमा की सतह के तापमान से चौंकाने वाली जानकारी मिली। पहली बार पता चला कि हाई एल्टिट्यूड वाले साउथ पोल का तापमान अनुमान से कहीं ज्यादा है। ये भी पता चला कि दक्षिणी ध्रुव के अंधेरे गड्ढों में सतह के नीचे अब भी अरबों टन बर्फ दबी हो सकती है। यानी भारत ने सिर्फ चांद तक पहुंचने का सपना पूरा नहीं किया…बल्कि पूरी दुनिया को ये दिखा दिया कि चांद सिर्फ एक बंजर जमीन नहीं… बल्कि संभावनाओं का खजाना है।

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