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मिडिल-ईस्ट वार : ईरान से आर्थिक वार में बुरा फंसा अमेरिका

ईरान से आर्थिक वार में बुरा फंसा अमेरिका
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admin

Mar 12, 202602:13 PM

गणेश साकल्ले

अमेरिका-इजराइल और ईरान की जंग आज तेरहवें दिन में प्रवेश कर गई है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका ईरान पर हमला कर आर्थिक जंग में बुरी तरह उलझ गया है। उसे इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल पा रहा है। दरअसल लड़ाई तो इजराइल और ईरान के बीच थी। इसमें अमेरिका ने कूदकर पूरी दुनिया को विश्व युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। अमेरिका अब तक अपने हमलों में किसी भी मकसद में सफल नहीं हो पाया है। अगर उसके घोषित इरादों में नजर डाले तो उसका मूल मकसद ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई समेत पूरी पहली पंक्ति को साफ करना था, किंतु इसमें भी वह पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है।

दूसरा लक्ष्य परमाणु ठिकानों को तबाह करना था। इसमें उसे सात महीने पहले हमले में कामयाबी मिली थी या अब मिली है, इसका कोई सही जवाब उसके पास नहीं है। तीसरा ईरादा ईरान में तख्ता पलट कर अपने पसंदीदा नेताओं को सत्ता के साकेत में बैठाना था, जो सफल नहीं हो पाया। 13 दिन में सैकड़ों हमले करने के बाद भी अमेरिका और इजराइल ईरान की हुकूमत को खदेड़ नहीं पाई है। इतना ही नहीं, वहां की जनता के दिलों में भी अमेरिका-इजराइल कोई जगह नहीं बना पाए हैं। सच पूछो तो यह सारे मुद्दे बहाना हैं, असल में तो अमेरिका को ईरान के तेल भंडार हथियाना है। इसके विपरीत ईरान ने बहुत ही सधी हुई रणनीति के तहत जवाबी हमले कर पूरे अमेरिका को आर्थिक युद्ध में फंसा दिया है। अमेरिका और इजराइल जिन आधुनिक हथियारों से ईरान पर हमले कर रहे हैं उसकी लागत कई करोड़ है, जबकि ईरान खाड़ी देशों के एक दर्जन देशों पर मिसाइल और ड्रोन दागकर अपने इरादे जाहिर कर चुका है। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो ईरान जिस ड्रोन से पड़ोसी देशों में स्थित अमेरिका के एयरबेस पर निशाने साध रहा है, उसकी लागत लभगग 16 लाख रुपए होती है। इन ड्रोन को ट्रेस कर मार गिराने में अमेरिका-इजराइल करीब 11 करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं। एक मोटे अनुमान के तहत बीते 13 दिनों में अमेरिका-इजराइल लगभग 30 हजार करोड़ से अधिक के आधुनिक हथियार चला चुके हैं।

इस जंग को लेकर अमेरिका में भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ आवाज उठने लगी है। वहां के पत्रकारों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने सवाल पूछे हैं कि अमेरिका का इस लड़ाई से सीधा क्या संबंध है। उनका कहना है कि इजराइल की लड़ाई ईरान से है, इसमें अमेरिका को क्यों पड़ना चाहिए। इसका सटीम जवाब अभी तक ट्रम्प की ओर से नहीं आया है। अपने ही मुल्क में विरोध मुखर होने से ट्रम्प की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। अब वे इस युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। पिछले दिनों उनके अलग-अलग बयानों से तो यही जाहिर होता है, लेकिन ईरान ने साफतौर पर सीजफायर करने से इनकार कर दिया है। उसका दावा है कि वह अमेरिका और इजराइल से लंबी लड़ाई के लिए तैयार है। खाड़ी देशों के तेल-कुओं, पेटृोलियम रिफाइनरी और दुबई जैसे बिजनेस हब पर ईरान ने हमले कर वहां की अर्थव्यवस्था को चैपट कर दिया है, जिसे पटरी आने में लंबा वक्त लगेगा।

अगर इस युद्ध के लाभ-हानि का आंकलन किया जाए तो अभी तक अमेरिका-इजराइल के हाथ ईरान में इन्फ्रास्टक्चर नष्ट करने और ज्यादातर निदोर्ष लोगों को मौत के घाट उतारने के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ है, जबकि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल और गैस लेकर निकलने वाले जहाजों को निशाना बनाकर इसकी मांग और आपूर्ति में बड़ा अंतर ला दिया है। इसके चलते पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया है। इसका सीधा असर भारत में भी दिखाई दे रहा है। रसोई गैस की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। साथ ही आवश्क वस्तुओं के दाम में भी अचानक उछाल आ गया है। आगे चलकर आम जरूरत की वस्तुएं और भी महंगी के आसार है।

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