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नीलम अहिरवार की विशेष रिपोर्ट
“दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई नहीं… साजिश चढ़ रही थी!” दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत पर चढ़ते समय जिन लोगों को आप अपना गाइड माने, अंतिम सहारा माने, अगर वो ही पैसों की खातिर आपकी जान के दुश्मन बन जाएं तो क्या होगा…नेपाल में ठीक यही हो रहा है. माउंट एवरेस्ट के गाइडों पर आरोप है कि वो पर्यटकों के खाने में चुपचाप चीज मिलाकर उन्हें बीमार कर देते थे, ताकि महंगे हेलीकॉप्टर रेस्क्यू कराए जा सकें….इस स्कैंडल के जरिए करीब 19.69 मिलियन डॉलर यानी करीब 190 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की गई। नेपाल पुलिस ने इस साजिश से जुड़े 32 लोगों पर संगठित अपराध और धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं…काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में ट्रेकिंग कंपनियों के मालिक, हेलीकॉप्टर ऑपरेटर और अस्पताल के अधिकारी शामिल हैं…अब ये सारा खेल कैसे रचा जाता था ये भी जान लिजिए
कैसे होता था यह जानलेवा स्कैम
पुलिस ने बताया कि ट्रेकिंग एजेंसियों के गाइड पर्यटकों के खाने में बेकिंग सोडा मिलाकर उन्हें बीमार कर देते थे.
-इससे पर्यटकों का पेट खराब हो जाता था, जो देखने में फूड पॉइजनिंग जैसी लगती थी.
-जब पर्यटक बीमार हो जाते थे, इसलिए बीमार या फंसे ट्रेकर को जल्दी काठमांडू पहुंचाना जरूरी होता है।
-ऐसे में उन्हें हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू किया जाता था..
- इसी सिस्टम का गलत फायदा भी उठाया जा रहा था
बीमार और फंसे टूरिस्टों पर दबाव डालकर महंगे इमरजेंसी हेलीकॉप्टर से उन्हें निकालने (एवैक्यूएशन) के लिए राजी कराया जाता था. अधिकारियों के अनुसार हेलीकॉप्टर कंपनियां नकली मेडिकल और फ्लाइट दस्तावेज बनाकर अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल इंश्योरेंस कंपनियों से पैसे वसूलती थीं.हालांकि बीमा कंपनियों के लिए सच का पता लगाना मुश्किल
बीमा कंपनियों के साथ खेल !
-रिपोर्ट के मुताबिक रेस्क्यू के दौरान एक ही हेलिकॉप्टर में कई लोगों को बैठाया जाता है, लेकिन हर व्यक्ति के नाम से अलग-अलग पूरा बिल बीमा कंपनी को भेजा जाता है,
-जैसे हर किसी के लिए अलग उड़ान हुई हो।
-जैसे 4000 डॉलर की उड़ान को 12000 डॉलर का क्लेम बना दिया जाता है।
-इसके लिए फर्जी फ्लाइट रिकॉर्ड बनाए जाते हैं।
-अस्पताल में भी नकली कागज तैयार होते हैं।
-सीनियर डॉक्टर के डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल करके रिपोर्ट बनाई जाती है,
-जबकि वो डॉक्टर उस केस में शामिल ही नहीं होते।
-कई बार तो डॉक्टरों को खुद पता नहीं होता कि उनके नाम से कागज बनाए गए हैं।
-कुछ मामलों में फर्जी रिकॉर्ड बनाकर पर्यटकों को अस्पताल में भर्ती दिखाया गया,
-जबकि सच में वो उसी समय अस्पताल की कैंटीन में बैठकर बीयर पी रहे थे।
-विदेश में बैठी बीमा कंपनियों के लिए यह जांच करना बहुत मुश्किल होता है कि दूर पहाड़ों में असल में क्या हुआ
वहीं एक हिंदी वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक
-इस पूरे खेल में शेरपा, हेलिकॉप्टर कंपनियां, ट्रेकिंग एजेंसियां और अस्पताल मिलकर पैसा बांट लेते थे।
- जांच जनवरी में शुरू हुई थी, जब 3 बड़ी रेस्क्यू कंपनियों के 6 अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था।
- इस स्कैंडल के जरिए करीब 19.69 मिलियन डॉलर (लगभग 190 करोड़ रुपए) की धोखाधड़ी की गई।
- एक कंपनी पर आरोप है कि उसने 1,248 रेस्क्यू में से 171 फर्जी दिखाए और 10 मिलियन डॉलर से ज्यादा का पैसा लिया।
-दूसरी कंपनी ने 471 में से 75 फर्जी रेस्क्यू दिखाकर करीब 8 मिलियन डॉलर कमाए।
- तीसरी कंपनी पर 71 फर्जी दावों के जरिए 1 मिलियन डॉलर से ज्यादा लेने का आरोप है।
- सरकारी पक्ष ने कुल 11.3 मिलियन डॉलर (करीब 107 करोड़ रुपए) के जुर्माने की मांग की है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए इसे प्राथमिकता दी है।
वहीं सीआईबी की लगभग तीन महीने की जांच में रिकॉर्ड में हेराफेरी और जाली दस्तावेजों की एक प्रणाली का खुलासा हुआ। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब इस समस्या का पता चला है। यह फर्जी रेस्क्यू स्कैंडल नया नहीं है। पहली बार 2018 में यह उजागर हुआ था। इसके बाद सरकार ने जांच कराई, 700 पेज की रिपोर्ट बनाई और सुधारों का ऐलान किया। 2019 में इस पर एक लंबी जांच रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई।
बताया जाता है कि नेपाल में पर्यटन से 10 लाख से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है…
लेकिन लगातार सामने आ रहे ऐसे घोटालों ने इस इंडस्ट्री की साख पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है…
हालात ये हैं कि कई अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों ने नेपाल में ट्रेकिंग करने वाले पर्यटकों को कवर देना तक बंद कर दिया है…
अब सबसे बड़ा सवाल यही है…
क्या ये मौत का खेल सिर्फ नेपाल तक सीमित है…
या फिर दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसा ही कोई खतरनाक जाल फैला हुआ है…?
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