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गणेश साकल्ले
अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध ने अब अखरने वाले आयाम अख्तियार कर लिए हैं। अगर यह टकराव जल्द नहीं थमा तो इसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक होंगे। एक ओर ईरान तो तबाह हो जाएगा, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ा जाएगी। इतना ही नहीं, इस युद्ध के बाद डाॅलर का एकाधिकार भी दरक सकता है। मजेदार बात तो यह है कि ईरान अब युद्ध रोकने के लिए ऐसी तीन शर्तें लगा रहा है, जिसे पूरा करना किसी के बस में नहीं, जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी चिरपरिचित शैली में कह रहे हैं कि वे जिस दिन चाहेंगे उस दिन युद्ध रोक देंगे। इजराइल के विदेश मंत्री का कहना है कि यह अनंत युद्ध नहीं है, इसे कब खत्म करना है, इस पर अमेरिका के साथ तालमेल बैठाया जाएगा। सच पूछो तो अमेरिका खुद इस युद्ध से निकलने का रास्ता खोज रहा है। वह कुर्द लड़ाकों को हथियार और पैसे देकर खुद पीछे हटने की फिराक में है।
इसी बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को मिडिल ईस्ट में मौजूद अपने सैन्य ठिकाने बंद कर देने चाहिए, अन्यथा उन पर हमले जारी रहेंगे। अगर यूएसए और इजरायल ने उसके अपने एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला किया तो वह इस इलाके की तेल और गैस इंडस्ट्री में तबाही मचा देगा। मगर मजेदार बात तो यह है कि अब इस वार को टालना या खत्म करना किसी एक पक्ष के बूते की बात नहीं है। अमेरिका और इजराइल अभी तक अपने किसी भी मकसद में कामयाब नहीं हो पाए हैं। वे ईरान में मिसाइलें और बम बरसाकर यह तसल्ली कर सकते हैं कि उन्होंने ईरान में तबाही मचा दी है। इसके सिवाय उनके हाथ अभी तक कुछ भी लगा है। न तो सुप्रीम लीडरशिप साफ हो पाई है और न ही वहां की जनता सरकार के खिलाफ खड़ी हो पाई है। तख्तापलट करने के मंसूबों पर भी फिलहाल पानी फिर गया है।
इसके उलट ईरान ने समूचे खाड़ी देशों को इकानाॅमिक वार में झोंक दिया है। इसमें अब अमेरिका और इजराइल भी झुलस रहे हैं, क्योंकि अमेरिका और इजराइल जिन अत्याधुनिक मिसाइलों और लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उस पर रोजाना करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। जवाबी हमले ईरान इतने सधे हुए और सटीक कर रहा है कि अमेरिका और इजराइल की हाईटेक रक्षा प्रणाली भी रोक नहीं पा रही है। मल्टीलेयर रक्षात्मक प्रणाली को भेद कर अब तक ईरान इजराइल को भी काफी नुकसान पहुंचा चुका है। इसके साथ ही ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमेरिका के सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया है, जिससे अमेरिका को काफी क्षति पहुंची है।
यह तो हुई युद्ध की बात। अब अगर आर्थिक पहलू पर प्रकाश डाले तो पता चलता है कि ईरान के जवाबी हमले में दुबई-रियाद समेत खाड़ी के एक दर्जन देश प्रभावित हुए हैं। इतना ही नहीं, इन मुल्कों में जान-माल का भी भारी नुकसान हुआ है। इन हमलों के बाद खाड़ी देशों में सभी इस बात से चिंतित हैं कि आखिर अमेरिका ने न तो उन्हें पर्याप्त सुरक्षा दी और न ही अभी तक हुई क्षति पूर्ति का कोई कदम उठाया है। ऐसे में खाड़ी देशों में यह राय बन सकती है कि वे अमेरिका के साथ क्यों खड़े हो। पेट्रो डाॅलर के विकल्प भी तलाशने पर भी मजबूर हो सकते हैं।
अमेरिका अगर इस युद्ध में हुए उनके नुकसान की भरपाई नहीं करता है तो उन्हें ही अपने संसाधनों से राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना होगा। यह भावना सभी खाड़ी देशों में पनप गई है और एक साथ सभी खाड़ी देशों ने नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिका पर दबाव बनाया तो उसे कुछ न कुछ करना होगा।
इतने बड़े पैमाने पर नुकसान की भरपाई करना उसके लिए मुमकिन नहीं है, अगर ऐसा करेगा तो उसकी उसकी अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ा जाएगी। अमेरिका के इनकार करने पर खाड़ी देश मजबूरी में अपना निवेश अमेरिकी बाजार से निकाल सकते हैं। इससे भी अमेरिका की अर्थव्यवस्था डोल जाएगी। इतना ही नहीं, पेट्रो डाॅलर के प्रचलन के पीछे भी अमेरिका का खाड़ी देशों की सुरक्षा का वादा है जो इस जंग में तार-तार हो गया। देखा जाए तो एक तरह से इजराइल-ईरान युद्ध में अमेरिका ने कूदकर पूरी खाड़ी देशों की सुरक्षा को भी खतरे में डाल दिया है। यह युद्ध समाप्त होने के बाद खाड़ी देश एक बार फिर डाॅलर के विकल्प पर विचार कर सकते हैं। ऐसे में वे करेंसी एक्सचेंज के जरिए भी तेल का निर्यात करने का विकल्प हो सकता है। जैसा भारत और रूस के बीच रुपए और रूबल में चल रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात तो साफ है कि दोनों ही स्थितियों में अमेरिका की अर्थव्यवस्था डावाडोल हो जाएगी। इसके चलते डोनाल्ड ने हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस से 100 विलियन डाॅलर का सप्लीमेंट्री बजट चाहा है। इस राशि का बड़ा हिस्सा विदेशी सहायता और सैन्य अभियानों पर खर्च किया जाएगा। इसी बजट में से इजराइल और यूक्रेन को सैन्य सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इसके साथ ही इंडो पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़ी धनराशि खर्च की होगी।
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