Latest News

नई दिल्ली। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मौजूदा वैश्विक तनाव के बीच 1956 के स्वेज संकट को याद करते हुए भारत की कूटनीतिक भूमिका को अहम बताया है। उन्होंने कहा कि जिस तरह उस समय भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संतुलन और शांति कायम करने में योगदान दिया था, वैसी ही समझदारी आज के दौर में भी जरूरी है।
रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि करीब 70 साल पहले दुनिया स्वेज संकट से जूझ रही थी। 26 जुलाई 1956 को मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, जिससे पश्चिमी देशोंकृविशेष रूप से ब्रिटेन और फ्रांसकृमें तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसके बाद 29 अक्टूबर 1956 को ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल ने मिस्र पर सैन्य हमला कर दिया, जिससे युद्ध जैसी स्थिति बन गई।
हालांकि, कुछ ही दिनों में उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर के हस्तक्षेप के बाद हमलावर देशों को पीछे हटना पड़ा। रमेश ने यह भी उल्लेख किया कि यही आइजनहावर इससे पहले ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देग को हटाने के अभियान को मंजूरी दे चुके थे। संघर्ष के थमने के बाद नवंबर 1956 में संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र आपातकालीन बल की तैनाती सिनाई और गाजा क्षेत्र में की। इस बल में भारत सहित 10 देशों ने भाग लिया और इसने जून 1967 तक क्षेत्र में शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए रमेश ने बताया कि इस मिशन में भारतीय सैन्य अधिकारियों ने नेतृत्व किया। दिसंबर 1959 से जनवरी 1964 तक लेफ्टिनेंट जनरल पी.एस. ज्ञानि और जनवरी 1966 से जून 1967 तक मेजर जनरल इंदरजीत रिक्ये ने इस बल की कमान संभाली। साथ ही, 20 मई 1960 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गाजा में तैनात भारतीय सैनिकों को संबोधित भी किया था।
रमेश ने यह भी कहा कि यूएनएफई की वापसी के तुरंत बाद 1967 में छह-दिवसीय युद्ध शुरू हो गया, जिसने क्षेत्र में बड़े संघर्ष को जन्म दिया। यह ऐतिहासिक संदर्भ ऐसे समय में सामने आया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है। हालिया हमलों के चलते जहाजों की आवाजाही धीमी हो गई है और तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।
Advertisement
