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नीलम अहिरवार
विश्व वन्यजीव दिवस 3 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के महत्व को बढ़ावा देना है. यह दिन हमें वन्यजीवों के अस्तित्व को बचाने और उनके संरक्षण के लिए वैश्विक जागरूकता फैलाने का अवसर प्रदान करता है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2013 में इसकी शुरुआत की गई थी, और तब से यह हर साल मनाया जा रहा है…
विश्व वन्यजीव दिवस की शुरुआत
दरअसल विश्व वन्यजीव दिवस की आधिकारिक शुरुआत 20 दिसंबर 2013 को हुई थी, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने अपने 68वें सत्र में 3 मार्च को इस दिन के रूप में नामित किया। पहला विश्व वन्यजीव दिवस 3 मार्च 2014 को मनाया गया।
विश्व वन्यजीव दिवस 2026 की थीम
विश्व वन्यजीव दिवस 2026 की थीम मानव जीवन में औषधीय और सुगंधित पौधों की महत्वपूर्ण भूमिका पर केंद्रित है। ये पौधे केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं।
इनका योगदान निम्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है—
पारंपरिक और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियाँ
सांस्कृतिक एवं आदिवासी ज्ञान परंपराएँ

सतत आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
विकासशील देशों में लगभग 70% से 95% लोग पौधों पर आधारित पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वनस्पति जैव विविधता का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है.
भारत में नेशनल वाइल्डलाइफ डे
भारत में, नेशनल वाइल्डलाइफ डे बहुत ज़रूरी भूमिका निभाता है क्योंकि हमारा देश बाघ, हाथी, गैंडे, शेर, तेंदुए और 1,300 से ज़्यादा पक्षियों की प्रजातियों का घर है। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट (1972) जैसे भारतीय कानून और प्रोजेक्ट टाइगर (1973) जैसे प्रोजेक्ट जानवरों को बचाने के लिए शुरू किए गए थे। आज, भारत में 500+ वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी और 100 से ज़्यादा नेशनल पार्क हैं, जिनमें जिम कॉर्बेट, गिर और काज़ीरंगा शामिल हैं। इस दिन, भारत के स्कूल स्टूडेंट्स को प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहने की अहमियत सिखाने के लिए खास असेंबली, पोस्टर कॉम्पिटिशन और जागरूकता कैंपेन आयोजित करते हैं।

भारत टाइगर स्टेट
भारत ने वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जैसे ‘Project Tiger’ और ‘प्रोजेक्ट एलिफेंट’ जैसे राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स की शुरुआत. भारत में राष्ट्रीय पार्क, वन्यजीव अभयारण्य और बायोस्फीयर रिजर्व्स की बड़ी संख्या है. इसके अलावा, भारत CITES और अन्य अंतरराष्ट्रीय संरक्षण समझौतों का पालन करता है
वन्यजीवों के संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
कानूनी और नीतिगत उपाय: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) और वन संरक्षण अधिनियम (1980) के माध्यम से लुप्तप्राय प्रजातियों के शिकार और अवैध व्यापार को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना: देशभर में राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और जीवमंडल रिजर्व (जैसे नीलगिरी, सुंदरबन, कान्हा) बनाकर उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित किया गया है।
प्रजाति-विशिष्ट परियोजनाएं: प्रोजेक्ट टाइगर (1973), प्रोजेक्ट एलीफेंट, और प्रोजेक्ट मगरमच्छ जैसी योजनाओं के द्वारा विशिष्ट लुप्तप्राय प्रजातियों की आबादी में वृद्धि की गई है।
पर्यावास का संरक्षण: वनरोपण, पुनर्वनरोपण और पारिस्थितिक बहाली के माध्यम से वन्यजीवों के आवास को सुरक्षित और पुनर्जीवित किया जा रहा है।
आधुनिक निगरानी: वनरक्षकों को आधुनिक हथियार प्रदान करना, ड्रोन तकनीक से निगरानी और गश्त बढ़ाना ताकि अवैध शिकार को रोका जा सके।
जन जागरूकता और भागीदारी: स्थानीय समुदायों को शामिल करना (सामुदायिक भागीदारी) और वन्यजीवों के महत्व के बारे में शिक्षा अभियान चलाना.
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ डे 2026 के खास फोकस एरिया
1. बायोडायवर्सिटी कंज़र्वेशन
वाइल्डलाइफ और पौधों की प्रजातियां इकोसिस्टम की रीढ़ हैं।
अकेले जंगल ही ज़मीन पर रहने वाली लगभग 80% प्रजातियों को सपोर्ट करते हैं।
2. सस्टेनेबल ट्रेड और रेगुलेशन
CITES और नेशनल कानूनों के ज़रिए कई देश खतरे में पड़े पेड़-पौधों और जानवरों के ट्रेड को रेगुलेट करने का मकसद रखते हैं।
3. क्लाइमेट और इकोलॉजिकल बैलेंस
हेल्दी इकोसिस्टम इनमें योगदान देते हैं
फूड सिक्योरिटी
क्लाइमेट स्टेबिलिटी
साफ हवा और पानी
मिट्टी की सुरक्षा
जैसे, पॉलिनेटर दुनिया भर में 75% मुख्य खाने की फसलें उगाने में मदद करते हैं।
चीतों की दहाड़ से गूंज रहा है भारत
करीब 70 वर्ष पहले भारत से विलुप्त हो चुके चीते अब प्रजनन दर में वृद्धि और नए चीतों के आयात के चलते फिर से देश की वन संपदा का हिस्सा बनते जा रहे हैं. कूनो राष्ट्रीय उद्यान में हालिया तैयारियाँ, लगातार निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन इस पुनर्वास प्रयास को गति दे रहे हैं.
वही यह अफ्रीकी चीतों का तीसरा दल है. इससे पहले सितंबर 2022 में नामीबिया से 8 चीते और फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते भारत लाए गए थे. नए दल के आने के बाद कूनो व देश में चीतों की संख्या बढ़कर 46 हो जाएगी. अधिकारियों ने बताया कि वर्तमान में कूनो में 35 चीते हैं, जबकि 3 चीते गांधी सागर अभयारण्य (मंदसौर) भेजे गए हैं. चीतों को अलग-अलग क्षेत्रों में रखने का उद्देश्य किसी संभावित बीमारी के फैलाव से पूरी आबादी को बचाना है. मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है
भारत में चीता पुनर्वास कार्यक्रम के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं. पिछले वर्ष 12 शावकों का जन्म हुआ, जिनमें से 6 शावकों की बाद में मृत्यु हो गई. इस वर्ष 7 फरवरी से 18 फरवरी 2026 के बीच 8 नए शावकों का जन्म हुआ है. वर्ष 2023 से अब तक कूनो में कुल 39 शावकों का जन्म हो चुका है, जिनमें से 27 जीवित हैं. इनमें नामीबिया मूल की मादा चीता ज्वाला और आशा, तथा दक्षिण अफ्रीका मूल की गामिनी, वीरा और निरवा शामिल हैं. कूनो में जन्मी भारतीय चीता मुखी भी इनमें योगदान दे चुकी है
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