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अमेरिका, इज़रायल और ईरान तनाव : युद्ध की आग से गले की प्यास पर संटक!

युद्ध की आग से गले की प्यास पर संटक!
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admin

Mar 13, 202604:48 PM

प्रसन्न शहाणे

अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच युद्ध का तनाव बढ़ता जा रहा है…जिसने दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ा दी है। क्रूड ऑयल की आपूर्ति बाधित होना भारत के लिए किसी बड़े संकट से कम नहीं है। तो दूसरी ओर एक और बड़ी चिंता पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर को लेकर सामने आ रही है। क्योंकि युद्ध का बढ़ता तनाव गर्मी की तपिश में अब आपकी प्यास पर भारी पड़ सकता है…

अमेरिका,इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध से केवल डीजल ,पेट्रोल ,एलएनजी ,सीएनजी की दिक्कतें नहीं बढ़ रही है बल्कि इस युद्ध का सीधा असर आपकी प्यास पर भारी पड़ सकता है ,,ये युद्ध गर्मियों में आपके कंठ को तर करने वाली पानी की बोतल को बाजार से गायब करने की ताकत भी रखता है।

गर्मियों की दस्तक के साथ ही आग उगलता सूरज लोगों के कंठ सुखाने लगा है… और तपती गर्मियों में शायद आपको अपनी प्यास बुझाने के लिए पहले से ज्यादा जद्दोजहद करनी पड़े। वजह कोई कुदरती अकाल नहीं, बल्कि इंसानी ज़िद और युद्ध है। अमेरिका और ईरान के बीच गहराता तनाव अब समुद्र के रास्ते होते हुए भारत की प्लास्टिक इंडस्ट्री के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। दरअसल, खाड़ी देशों में युद्ध की आग धधकने और क्रूड ऑयल की सप्लाई बाधित होने से इसके बाय-प्रोडक्ट्स का उत्पादन प्रभावित होने लगा है। खासतौर पर प्लास्टिक इंडस्ट्री पर संकट की आहट सुनाई देने लगी है। बाय-प्रोडक्ट के रूप में बनने वाले प्लास्टिक के दानों से पीने के पानी की बोतलें बनाई जाती हैं… और इन्हीं ग्रेन्यूल्स की सप्लाई महज दो बड़ी कंपनियां देश में करती है । जिसकी उपलब्धता अब बाजार में दिन-ब-दिन कम होती जा रही है।

प्लास्टिक का दाना, जिसे हम रेज़िन कहते हैं, सीधे तौर पर कच्चे तेल का बाय-प्रोडक्ट है। देश में बोतलबंद पानी बनाने वाले बड़े ब्रांड्स तो शायद इस झटके को कुछ हफ्तों तक सह जाएं, लेकिन असली संकट उन छोटी इकाइयों पर है जो हर शहर और कस्बे में बोतलबंद पानी मुहैया कराती हैं। भोपाल में बोतलबंद पानी बनाने वाली लाल आयन एक्सचेंज के एमडी आर. के. रवि ने बताया कि लागत सिर्फ पानी की नहीं है, बल्कि उस बोतल और ढक्कन की भी है। अगर कच्चा माल इसी तरह महंगा होता रहा और सप्लाई रुकी रही, तो छोटी यूनिट्स के लिए प्रोडक्शन जारी रखना नामुमकिन हो जाएगा। हम सप्लाई और मांग के बीच फंसे हुए हैं।

चलिए अब आपको बताते हैं कि भारत में पैकेज्ड पानी का बाजार कितना बड़ा है और कितनी तेजी से बढ़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार —

6 साल पहले दैनिक पानी की खपत लगभग 15 करोड़ लीटर थी।

2021 में वार्षिक खपत 23,605 मिलियन लीटर थी।

2026 तक बढ़कर 2,744.47 करोड़ लीटर (लगभग 75 मिलियन लीटर दैनिक खपत) होने का अनुमान है।

एक अनुमान के अनुसार हर महीने करीब 450 करोड़ बोतल पानी की खपत होती है।

भारत में लगभग 12% शहरी परिवार बोतलबंद पानी का उपयोग करते हैं।

उत्तर भारत 32.31% बाजार हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा बाजार है।

जबकि पश्चिम भारत सबसे तेज गति से बढ़ रहा है।

लगभग 92% से अधिक बाजार हिस्सेदारी के साथ PET (पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट) बोतलें सबसे प्रमुख हैं।

मार्केटलाइन के अनुसार, 2022 में भारत का पैकेटबंद पानी का बाजार लगभग 905 अरब रुपये का था। अनुमान है कि यह बाजार 2027 तक 10.3% की CAGR से बढ़कर लगभग 1,480 अरब रुपये तक पहुंच जाएगा…भारत इस क्षेत्र का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे तेजी से बढ़ता पैकेटबंद पानी का बाजार है…जो पूर्वानुमानित विकास दर के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ रहा है। लेकिन रॉ मटेरियल की कमी इस बाजार पर भारी संकट बनकर टूट सकती है। इसे लेकर आम जनता और बोतल सप्लायर्स ने भी चिंता व्यक्त की है।

- हालांकि युद्ध को लेकर दिन-ब-दिन बढ़ते संकट के बीच अब कंपनियां कुछ नए प्रयोग करने के मूड में भी हैं। क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को अचानक बंद कर देना कई लोगों के रोजगार को भी प्रभावित कर सकता है लिहाजा कुछ पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर बनाने वाले अब प्लास्टिक की बोतलों की जगह कांच की बोतलों को बाजार में उतारने की व्यावहारिकता पर गंभीरता से सोच रहे हैं ।उपयोग करने पर विचार कर रहे हैं।

संकट सिर्फ महंगाई का नहीं, बल्कि उपलब्धता का भी है। अगर सप्लाई चेन टूटी, तो आने वाले महीनों में बोतलबंद पानी बाजार से नदारद हो सकता है। एक तरफ उद्यमी काम बंद करने की कगार पर हैं, तो दूसरी तरफ आम आदमी यह सोचकर परेशान है कि क्या अब प्यास बुझाना भी उसकी पहुंच से बाहर हो जाएगा? साफ है कि सरहदों की लड़ाई अब हमारी थाली और पानी की बोतल तक आ पहुंची है… और इसके परिणाम क्या हो सकते हैं, इसे सोचकर आम आदमी डरा हुआ है

प्लास्टिक बनने की प्रक्रिया

* कच्चा माल: सबसे पहले पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस को परिष्कृत किया जाता है, जिससे एथिलीन और प्रोपलीन जैसे छोटे अणु या मोनोमर प्राप्त होते हैं।

* पॉलिमराइजेशन  इन छोटे अणुओं (मोनोमर) को एक विशेष प्रक्रिया के जरिए आपस में जोड़कर लंबी श्रृंखलाएं बनाई जाती हैं, जिन्हें 'पॉलिमर' कहते हैं।

* दैनिक रूप में ढालना: तैयार प्लास्टिक पॉलिमर को अक्सर छोटे दानों (pellets) के रूप में उत्पादकों को भेजा जाता है।

* आकार देना

 इन दानों को पिघलाकर, रंग और अन्य रसायन मिलाकर इंजेक्शन मोल्डिंग या ब्लो मोल्डिंग जैसी मशीनों का उपयोग करके बाल्टी, बोतल, कुर्सी जैसी वस्तुओं में ढाला जाता है

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