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भोपाल। मध्यप्रदेश में सूक्ष्म और लघु उद्यमों के विकास के लिए मप्र लघु उद्योग निगम के माध्यम से विकसित क्लस्टरों के निर्माण में ठेकेदार सरकारी खनिज चुराकर निर्माण कार्य करते रहे, लेकिन एलयूएन ने न तो इनसे रॉयल्टी की कटौती कर सरकारी खजाने में जमा कराया और न ही अंतिम भुगतान के समय ही ठेकेदारों से रॉयल्टी का नोड्यूज प्रमाण पत्र ही लिया। निर्माण फर्मों को रॉयल्टी भुगतान का शपथ पत्र लेकर मुक्त कर दिया गया। मप्र लघु उद्योग निगम के अधिकारियों की इस तरह की लापरवाही नियंत्रक महालेखापरीक्षक के मार्च 2023 को समाप्त वर्ष के लिए प्रतिवेदन में उजागर हुई है।
शपथ पत्र में नहीं दिया खरीदी का विवरण
मप्र उच्च न्यायालय जबलपुर में वर्ष 2016 में दायर एक याचिका के फैसले के आदेश के अनुसार ठेकेदार द्वारा दिए गए शपथ पत्र में खरीदे गए खनिजों का विवरण स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए, जिससे उस व्यक्ति का विवरण भी शामिल हो, जिससे खनिज खरीदे गए थे।इस प्रकरण में भुगतान का दावा करने के लिए ठेकेदार ने प्रस्तुत शपथ पत्र में इस तरह की जानकारी नहीं दी। इस कारण रॉयल्टी के भुगतान का पता नहीं चल सका।
सत्यापन के बिना किया 2.79 करोड़ का भुगतान
लघु उद्योग निगम ने भुगतान की गई रॉयल्टी के सत्यापन के बिना ही ठेकेदार को 2.79 करोड़ रुपये राशि का भगुतान कर शासन के आदेशों का उल्लंघन किया। ठेकेदार द्वारा खनिज रॉयल्टी का नोड्यूज प्रमाण पत्र नहीं देने की स्थिति में उसके बिल से रॉयल्टी काटकर संबंधित मद में जमा करानी थी। लेकिन अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया।
ठेकेदारों पर नहीं लगाया 1.66 करोड़ का जुर्माना
अनुबंध शर्तों के अनुसार निर्माण कार्य और नियमित रखरखाव के लिए ठेकेदार को तकनीकी व्यक्ति नियुक्त करने थे। ठेकेदार ने ऐसा नहीं किया। जिसके लिए उस पर प्रत्येक ग्रेजुएट इंजीनियर के लिए 30 हजार रुपये प्रति माह और डिप्लोमा इंजीनियरध्आईटी सॉफ्टवेयर के लिए 18 हजार रुपये प्रति माह जुर्माना लगना था। चयनित 57 कार्य अनुबंधों में से 14 में अनिवार्य तकनीकी कर्मचारियों की तैनाती के दस्तावेज नहीं मिले। वहीं 23 में इनकी तैनाती तो की गई, लेकिन इनकी संख्या निविदा शर्तों में निर्धारित न्यूनतम आवश्यकता से कम थी। इसके लिए ठेकेदारों पर 1.66 करोड़ का जुर्माना लगना था,जो नहीं लगाया गया।
पूर्णता में देरी पर 5.71 करोड़ कम वसूले
अनुबंध शर्तों के अनुसार काम निर्धारित अवधि में पूरा नहीं होता है तो ठेकेदार पर प्रतिदिन 0.05 प्रतिशत की दर से हर्जाना लगाया जाता है जो अनुबंध मूल्य के अधिकतम 10 प्रतिशत तक हो सकता है। 57 चयनित अनुबंधों में से 29 में काम में 87 दिन से लेकर 577 दिन तक की देरी हुई। इसके लिए ठेकेदारों पर 5.74 करोड़ परिसमापन हर्जाना (एलडी) वसूला जाना था। लेकिन ईएण्डसी डिवीजन ने 17 अनुबंधों में केवल 3.14 लाख का एलडी लगाया। वहीं 12 अनुबंधों में 87 से 560 दिनों की देरी पर कोई एलडी नहीं लगाई गई।
यहां भी रही ठेकेदारों पर मेहरबानी
30 दिनों में क्षेत्रीय प्रयोगशाला की स्थापना न करने पर ठेकेदार पर प्रतिमाह 50 हजार तक जुर्माना लगना था। 57 में से 26 मामलों में ऐसा नहीं किया, जिस पर 76 लाख का जुर्माना नहीं लगाया गया।
सात अनुबंधों राशि 40 लाख से 95 लाख तक बढ़ा दी गई। जो वास्तविक मूल्य से 32.05 से 137.33 प्रतिशत तक अधिक थी।
फर्जीचर खरीद की निविदा प्रक्रिया में ब्लैकलिस्ट फर्मों को काम दिया गया।
गैल्वनाईज्ड माइल्ड स्टील ट्यूबों की निविदा में अनुबंधित तीन आपूर्तिकर्ताओं द्वारा आपूर्ति नहीं करने पर 60 लाख की सुरक्षा राशि जब्त करने की कार्रवाई नहीं की गई।
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