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भोपाल। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य किये जाने के बाद सरकार पसोपेश में है। उसे अब इस मामले में निर्णय लेना है। इधर शिक्षक संगठनों के विरोध को देखते हुए संबंधित सरकारी एजेंसियों ने समस्या समाधान पर विमर्श शुरू कर दिया है। इसी क्रम में मप्र लोक शिक्षण संचालनालय की शिक्षक कल्याण समिति ने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख करे। हालांकि सरकार ने इस बारे में अभी तक अपना आधिकारिक रुख जाहिर नहीं किया है।
मप्र लोक शिक्षण संचालनालय की शिक्षक कल्याण समिति के शिक्षाविद् सदस्य छत्रवीर सिंह राठौर ने बताया कि इस मामले में राज्य सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी गइ र्है। इनका कहना है कि 2011 से पहले भर्ती हुए शिक्षकों पर यह नियम लागू नहीं होगा, क्योंकि आरटीई का कानून से पहले सरकार ने इनको नियुक्ति पत्र प्रदान कर दिये थे। उनके मुताबिक कल्याण समिति के प्रतिनिधि मंडल ने हाल ही में सरकार के शीर्ष पदाधिकारियों से मुलाकात कर अपनी बात रखी थी।
पात्रता परीक्षा से यह लाभ
पात्रता परीक्षा से शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता सुनिश्चित होती है
इससे स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर होगी
शिक्षक भर्ती एक समान मानक अनुरूप हो जाएगी
शिक्षक इसलिये कर रहे विरोध
लाखों शिक्षकों को डर है कि परीक्षा न पास होने पर नौकरी चली जाएगी।
इसके साथ ही प्रमोशन पर भी असर पड़ सकता है।
शिक्षाविद ने क्या कहा...
नौकरी पर संकट नहीं खड़ा करें परिणाम
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित पूर्व प्राचार्य व शिक्षाविद् डॉ उषा खरे ने पात्रता परीक्षा को दक्षता आंकलन की दृष्टि से ठीक माना है। हालांकि उन्होंने कहा है कि इसके पहले सरकार की तरफ से यह स्पष्ट करना चाहिये पात्रता परीक्षा के परिणाम से नौकरी पर संकट नहीं खड़ा करेगी।
सेवा शर्तों में नहीं हो सकता बदलाव
शिक्षक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सूर्य प्रकाश सक्सेना के मुताबिक नियुक्ति के बाद सेवा शर्तों में बदलाव करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता है। इनका कहना है कि मध्य प्रदेश में शिक्षकों की नियुक्तियां शिक्षाकर्मी भर्ती अधिनियम 1997, 1998, अध्यापक भर्ती अधिनियम 2008 और 2018 जैसे विभिन्न भर्ती नियमों के तहत हुई हैं। इन सेवा नियमों में परीक्षा उत्तीर्ण करना कहीं भी सेवा शर्त के रूप में उल्लेखित नहीं है।
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