Latest News

मुंबई । फिल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा अक्सर गंभीर विषयों पर बेबाकी से अपनी राय रखते नजर आते हैं। इसी कड़ी में उन्होंने समाज में दमन और क्रांति के बीच गहरा संबंध बताते हुए कहा कि जब दमन एक निश्चित हद पार कर जाता है, तो क्रांति होना तय हो जाता है। यह किसी ट्रेन दुर्घटना की तरह अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे सुलगते हुए फूट पड़ती है।
प्रकाश झा ने बताया, "क्रांति स्वाभाविक और कुदरती प्रक्रिया है। ज्वालामुखी फटेगा ही। दमन से अंदर बहुत कुछ जमा होता रहता है और जब बर्दाश्त की सीमा पार हो जाती है, तो वह फूट पड़ता है। हम अचानक नींद से नहीं जागते। क्रांतियां भी धीरे-धीरे बनती हैं। समय सबसे बड़ा शिक्षक है। अगर हम समय के साथ जिएं और उसे समझें, तो वह हमें सब कुछ सिखा देता है।" प्रकाश झा का मानना है कि सिनेमा समाज को आईना दिखाने का माध्यम है। यह दमन, असमानता और अन्याय जैसे मुद्दों पर बात कर सकता है, लेकिन हमेशा जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ।
प्रकाश झा ने सिनेमा की जिम्मेदारी पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि फिल्ममेकर को हर संवाद, हर छवि और हर कहानी की संवेदनशीलता समझनी चाहिए। सिनेमा का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ना और कुछ खास भावनाएं जगाना भी है। अगर आप कुछ कहना चाहते हैं, तो कहिए, लेकिन संवेदनशीलता के साथ। लोगों से कतराना नहीं चाहिए, अस्थिरता नहीं फैलानी चाहिए। रचनात्मक तरीके से बातचीत करनी चाहिए, इसे दिलचस्प और आकर्षक बनाए रखना चाहिए।"
फिल्ममेकर ने थिएटर और ओटीटी के बीच बढ़ते अंतर पर भी बात की। वे खुद जमशेदपुर में एक मल्टीप्लेक्स चलाते हैं, इसलिए उन्हें भारत के थिएटर इकोसिस्टम की जमीनी हकीकत अच्छी तरह पता है। उन्होंने कहा कि बड़े बजट वाली मनोरंजक फिल्में स्क्रीन शेयरिंग में छोटी फिल्मों को पीछे छोड़ देती हैं, लेकिन हर फिल्म का अपना मार्केट होता है और हर फिल्म के लिए जगह है। ओटीटी पर सीधे रिलीज का फैसला ज्यादातर व्यावसायिक कारणों से लिया जाता है, क्योंकि थिएटर में रिलीज के जोखिम और खर्च ज्यादा होते हैं।
Advertisement
