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अलविदा हरीश राणा : 13 साल की लंबी खामोशी का हुआ अंत, माता-पिता ने बेटे को बनाया अमर

13 साल की लंबी खामोशी का हुआ अंत, माता-पिता ने बेटे को बनाया अमर
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admin

Mar 25, 202612:44 PM

नई दिल्ली। कभी जिंदगी से भरे सपनों के साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने निकले हरीश राणा ने 13 साल तक कोमा में रहने के बाद दुनिया को अलविदा कह दिया है। गमगीन माहौल में बुधवार सुबह उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया है। इस दौरान सभी के आंखों से आंसू बह रहे थे। बता दें कि भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले पहले शख्स हरीश राणा का मंगलवार को शाम 4ः10 बजे निधन हो गया। वह पिछले 13 साल से कोमा में थे।

असहनीय पीड़ झेलकर 13 साल बाद हरीश राणा दुनिया को जरूर अलविदा कह दिया है, लेकिन उनके माता-पिता ने अपने बेटे को अमर बना दिया है। सूत्रों के अनुसार, उनके माता-पिता की सहमति से एम्स में उनकी दोनों आंख के कॉर्निया व हृदय के वाल्व दान किया गया गया। हालांकि, एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि हरीश का हृदय, किडनी व लिवर दान नहीं हो सकता था। लेकिन, परिवार की सहमति से दोनों कॉर्निया व हृदय के चारों वाल्व लेकर सुरक्षित रख दिया गया है। इसके बाद पार्थिव शरीर परिजनों को सौंप दिया गया है। हरीश के परिजनों ने उनकी मौत के बाद हरीश के क्रियाशील अंगों को दान करने की इच्छा जताई थी।

13 साल की लंबी खामोशी का अंत

हरीश 2013 में हॉस्टल के चैथे फ्लोर से नीचे गिरने के बाद कोमा में चले गए थे और तब से लगातार लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे। बताया जाता है कि पंजाब विश्वविद्यालय से बीटेक कर रहे हरीश राणा चैथी मंजिल से गिर गए थे। सिर में गंभीर चोट लगी और इसके बाद उनकी जिंदगी अस्पताल और मशीनों के बीच सिमट कर रह गई। समय बीतता गया, लेकिन होश कभी वापस नहीं आया. परिवार के लिए यह इंतजार धीरे-धीरे एक अंतहीन पीड़ा में बदलता चला गया।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले में हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। अदालत ने पूरी संवेदनशीलता के साथ इस मामले को सुना और मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत प्रक्रिया की अनुमति दी। इसके बाद 14 मार्च को हरीश राणा को दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया। यहां पेलिएटिव केयर यूनिट में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनके साथ रही. डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया शुरू की। यह कोई अचानक लिया गया कदम नहीं था, बल्कि पूरी मेडिकल निगरानी में चरणबद्ध तरीके से किया गया। इस दौरान यह सुनिश्चित किया गया कि हरीश को किसी भी तरह का दर्द या असुविधा न हो। उन्हें लगातार दर्द निवारक दवाएं दी जाती रहीं, ताकि अंतिम समय में उन्हें शांति मिले।

बेसुध बेटे को घर की हर बात बताती थी हरीश की मां

हरीश राणा की मां ने अपने बेटे की हालत को लेकर भावुक करते हुए बताया कि वह लंबे समय से बेसुध था और अपनी पीड़ा भी व्यक्त नहीं कर पाता था। उन्होंने कहा कि एक मां के लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है कि उसका बच्चा अपनी तकलीफ तक न बता सके। उन्होंने बताया कि वह रोज सुबह-शाम उसकी मालिश करती थी और उसे घर की सारी बातें सुनाती थीं। आज क्या हुआ, कौन आया, क्या-क्या हुआ। कई बार घंटों तक इंतजार करती रहती थी कि वह एक बार पलक झपका दे, ताकि मुझे लगे कि उसने मेरी बातें सुन लीं। उन्होंने कहा कि बेटे की छोटी-छोटी हरकतें ही उनके लिए सुकून का सहारा थीं। कभी उसे उबासी आती, कभी छींक आती या आंखों के आसपास की त्वचा फड़कती, तो हमें उसी से यह एहसास होता था कि वह जिंदा है। हरीश राणा की मां ने कहा कि अब जब उसके जीवन की अंतिम घड़ियां आ पहुंची हैं, तो उनके लिए यह स्थिति बेहद कठिन है।

टीम में थे ये विभाग शामिल

इससे पहले मरीज की देखभाल को लेकर डॉक्टर पूरी तरह सतर्क थे। एम्स की पूर्व ऑन्को-एनेस्थीसिया प्रमुख डॉ सुषमा भटनागर ने बताया था कि इस प्रक्रिया में मरीज को दिए जाने वाले पोषण को धीरे-धीरे कम किया जाता है या बंद किया जाता है। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाता है कि उसे किसी प्रकार का दर्द न हो। इसके लिए लगातार दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज को आराम मिले और उसे किसी तरह की पीड़ा महसूस न हो। इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के लिए डॉक्टर सीमा मिश्रा के नेतृत्व में एक विशेष मेडिकल टीम गठित की गई थी। इस टीम में न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया, पेलिएटिव मेडिसिन और मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ शामिल थे।

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