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गणेश साकल्ले
एक अदद चादर की असली अहमियत मनुष्य को घर से बाहर निकलने और खासतौर पर रेल यात्रा के दौरान ही समझ में आती है। वैसे तो कवि वृंद का वह दोहा प्राइमरी स्कूल से ही हमारे दिमाग में इंस्टॉल कर दिया गया था कि ‘अपनी पहुंच बिचारि के करतब करिये ठौर, तेते पांव पसारिए जैती लांबी सौर।' सीधा-सा गणित है कि अपनी हैसियत के अनुसार पहले से ही अपनी चादर की इंच-टेप से पैमाइश कर लेनी चाहिए।
पिछले दिनों पंजाब मेल से मुंबई की यात्रा का सुयोग बना। टिकट तो फर्स्ट एसी का कटाना चाह रहे थे, मगर फिर कवि वृंद का वही दोहा याद आ गया। तो हमने अपनी ‘चादर' के अनुसार सेकेंड एसी का टिकट कटाया और कोच में दाखिल हो गए। अटेंडेंट महोदय अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ आए और एक कंबल, एक तकिया और दो चादरों का सेट रखकर चले गए।
रात्रिभोज के पश्चात बर्थ पर बैठे मुसाफिरों के बीच शुरू हो गई वैश्विक युद्धों जैसे विषयों पर गपशप। हर कोई ट्रम्प को गरियाने के मूड में नजर आ रहा था और वार्ता का लब्बोलुआब यही था कि ट्रम्प महोदय के लिए गाजा या सीरिया तक तो ठीक था, मगर उन्हें अपनी चादर ईरान तक तानने की क्या जरूरत थी?
खैर, अपन ने एक चादर बर्थ की मर्यादा बचाने के लिए बिछाई और दूसरी ओढ़ने के लिए उठा ली। पर जैसे ही चादर ओढ़ी, एक दार्शनिक संकट खड़ा हो गया। पांव ढंकता तो सिर लावारिस हो जाता और सिर ढंकता तो पांव। बरबस किसी शायर की ये पंक्तियां दिमाग में चली आईं कि ‘इतनी छोटी है मेरी चादर कि जिसमें पांव ढांकूं तो मेरा सर खुल जाता है।'
आसपास के सहयात्रियों का जहां खर्राटा ‘संगीत समारोह' शुरू हो गया था, मैं आधे घंटे तक इसी ‘चादर-युद्ध' में उलझा रहा और इस उधेड़बुन में लगा रहा कि पांव सिकोड़ूं या सिर? तभी जेहन में एक और शेर कौंधा, ‘पांव सिकोड़ूं तो चादर बड़ी हो जाती है, ये हुनर आ जाए तो मुश्किलें खड़ी नहीं होतीं।’
दार्शनिक विचारों के इस घटाटोप के बीच ‘सिस्टम' का नुमाइंदा यानी अटेंडेंट फिर से हत्थे चढ़ गया। हमने उसे अपनी समस्या बताई। वह किसी मंझे हुए राजनेता की तरह जोर से ठहाका मारकर हंसा और चुटीले अंदाज में बोला, ‘बाबूजी, चादर छोटी पड़ गई? कोई बात नहीं, हम आपको दूसरी दे देते हैं।’ उसने अपने साथी को आवाज लगाई और कहा कि इन्हें एक लंबी चादर लाकर दे दो। उसका साथी बिजली की गति से गया और मुझे एक नई व लंबी चादर थमा दी।
मैंने अपने पत्रकार स्वभाव के चलते उसे थोड़ा और कुरेदने की कोशिश की, मगर वह यह कहकर चलता बना, ‘बाबूजी, अब आप सो जाइए। दुनियादारी शायद आप मुझसे ज्यादा जानते होंगे।’ उसके इन शब्दों के मायने मैं आधी रात तक खोजता रहा। उसने कहा नहीं, मगर वह शायद यही कहना चाहता था कि यहां तो पूरा सिस्टम ही अनावृत है। कहां-कहां ढंकोंगे। जितना ढंक जाए, उतने में ही खैरियत समझो।
नींद तो नहीं आई, अलबत्ता सिस्टम के कई पहलू मन-मस्तिष्क में घुमड़ते रहे। आखिर में मन को यह समझाकर सोना ही मुनासिब समझा कि इस दौर में ‘कागजों की इमारतें और फाइलों के ढेर हैं, बिना कमीशन के यहां कानून भी अंधेर है।'
इसे दूसरे रूप में देखें तो आज का सच यही है कि ‘बिकता है यहां इंसाफ भी बस दाम लगाइए, ईमान की क्या बात है, कभी बाजार आइए!'
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