Latest News

बहरोड़। आचार्य प्रसन्न सागर महाराज इन दिनों ‘अहिंसा संस्कार पदयात्रा’ निकाल रहे हैं। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य समाज के विभिन्न तबकों के लोगों से मुखातिब होकर उन्हें मानवता का संदेश देकर उनके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना है।
आचार्य का मानना है कि अब वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और विनोबा भावे से प्रेरित होकर यह यात्रा निकाल रहे हैं। उन्हें विश्वास है कि आगामी दिनों में यह यात्रा लोगों के बीच में एक अमिट छाप छोड़ेगी। आचार्या ने इस यात्रा के बारे में सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में पूरी जानकारी दी।
2 अक्टूबर को गुवाहाटी और असम से शुरू हुई थी यात्रा
उन्होंने बताया कि 2 अक्टूबर 2004 को इस यात्रा का शुभारंभ गुवाहाटी और असम से किया था। तब वहां के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने हमसे सवाल किया था कि आखिर इस यात्रा का उद्देश्य क्या है? आप इस यात्रा के जरिए आम लोगों के बीच में क्या साबित करना चाहते हैं और उनके बीच किस तरह का संदेश प्रचारित करना चाहते हैं? तो हमने बताया कि आज की तारीख में लोगों के बीच में नैतिकता और भाईचारा समाप्त हो चुका है। हम इस यात्रा के जरिए लोगों के बीच इसी नैतिकता को जिंदा करना चाहते हैं। निसंदेह अगर हम ऐसा करने में सफल हुए, तो हम यह मान लेंगे कि हमारी यह यात्रा सार्थक साबित हुई।
मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी है नैतिकता और भाईचारा
आचार्य ने कहा कि आज लोगों के बीच में नैतिकता और भाईचारा अपनी मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी है। हमारा मकसद इस यात्रा के जरिए इसी भाईचारे और नैतिकता को जिंदा करना है। इस नैतिकता को हम विभिन्न तरीके से जिंदा कर सकते हैं, जिसमें सबसे प्रमुख मैं समझता हूं कि पेड़ लगाना है। आप अपने घर के पास एक ऐसा पेड़ लगाइए जिससे आपके पड़ोसी को भी उसकी छांव मिले। ऐसा करके आप अपनी नैतिकता को जिंदा रख सकते हैं।
मनुष्य की दुर्दशा पशुओं से भी बदतर
उन्होंने कहा कि अगर मनुष्य चाहे तो वह अपने स्तर को बढ़ा सकता है। आज की तारीख में मनुष्य किस दोयम दर्जे में पहुंच चुका है, इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। आज मनुष्य की दुर्दशा पशुओं से भी बदतर हो चुकी है। ना ही उसके खाने का कोई निर्धारित समय है और ना ही नहाने का। उसकी दुर्गति अपने चरम पर पहुंच चुकी है, लेकिन वह इसमें किसी भी प्रकार का सुधार करता हुआ नजर नहीं आ रहा है।
खाने के लिए जी रहा आज का मनुष्य
आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने कहा कि आप हम जैसे साधुओं की स्थिति देख लीजिए। हम लोग दिन में एक बार ही भोजन ग्रहण करते हैं और 30 से 35 किलोमीटर बहुत ही आराम से चल लेते हैं। हमें इसमें किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं होती है। वहीं, आज की तारीख में मनुष्य की दुर्गति का अंदाजा आप महज इसी से लगा सकते हैं कि वो एक दिन में कई बार भोजन करता है। लेकिन, वो मंदिर तक जाने की जहमत नहीं उठाता। ऐसी स्थिति में आप ईश्वर के प्रति उसकी निष्क्रियता का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं। आज का मनुष्य खाने के लिए जी रहा है और मरने का इंतजार कर रहा है।
Advertisement
