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प्रसन्न शहाणे
हारे हुए नेताओं को निगम मंडलों में एडजेस्ट नहीं करेंगे हेमंत खंडेलवाल का यह बयान मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर एक नई रणनीति की ओर इशारा करता है। उनके इस रुख से पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं और चुनाव हार चुके वरिष्ठ नेताओं के बीच समीकरण बदल सकते हैं।
इस बयान के पीछे की अहम वजहों का आंकलन करें तो समझ में आता है की राष्ट्रीय संगठन की मंशा भांपते हुए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने बिना लाग लपेट के सीधे और सपाट शब्दों में ये फरमान सुनाया है ,,पार्टी चाहती है की कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना है तो हारे हुए नेताओं को तवज्जो देना बंद करना होगा ,, लंबे समय से संगठन में यह मांग उठती ही रही है कि जो कार्यकर्ता जमीन पर रहकर मेहनत करते हैं, उन्हें सत्ता में भागीदारी मिलनी चाहिए। श्हारे हुए नेताओंश् को दूर रखकर खंडेलवाल संभवतः उन सक्रिय कार्यकर्ताओं को मौका देना चाहते हैं जो पिछले कई चुनावों से हाशिए पर थे।
मध्य प्रदेश में निगम-मंडलों की नियुक्तियां लंबे समय से चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हेमंत खंडेलवाल के हालिया बयान ने उन नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं जो चुनाव हारने के बाद पुनर्वास की उम्मीद लगाए बैठे थे।
लगता है पार्टी अब परफॉर्मेंस आधारित राजनीति चाहती है
यानी पार्टी अब केवल कद या पुराने अनुभव के आधार पर पद बांटने के मूड में नहीं है। चुनावी हार को जवाबदेही से जोड़कर बीजेपी एक ऐसा कल्चर विकसित करना चाहती है जहाँ जीत ही सबसे बड़ी योग्यता मानी जाए। इससे न केवल गुटबाजी पर लगाम लगेगी बल्कि जो नेता चुनाव हारने के बाद भी निगम-मंडलों के जरिए अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश करते हैं वो भी अलग थलग पड़ जायेंगे साथ ही इस नए फॉर्मूले से वरिष्ठ नेताओं का दबाव कम होगा और नए चेहरों को उभरने का रास्ता मिलेगा।
वर्तमान में लगभग 40 से अधिक ऐसे बोर्ड, निगम और प्राधिकरण हैं जहाँ अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद रिक्त हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं एमपी हाउसिंग बोर्ड , मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम ,नागरिक आपूर्ति निगम , पर्यटन विकास निगम
और कृषि विपणन बोर्ड
खंडेलवाल के श्हारे हुए नेताओं को जगह नहींश् वाले फॉर्मूले के बाद अब ऐसे चेहरों पर नजर रहेगी जो संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ता हो , वे नेता जो दशकों से संगठन में जिला अध्यक्ष या प्रदेश पदाधिकारी रहे हैं, लेकिन उन्हें कभी चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला। सरकार को सिंधिया खेमे के उन नेताओं को भी संतुष्ट करना होगा जो वर्तमान में किसी सदन के सदस्य नहीं हैं, लेकिन सक्रिय हैं। जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाना भी जरूरी है लिहाजा नियुक्तियों में मालवा-निमाड़ और ग्वालियर-चंबल के साथ-साथ विंध्य क्षेत्र को साधने की कोशिश की जाएगी, ताकि 2028 के लिए सामाजिक समीकरण भी दुरुस्त रहें। यानी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष के लिए अपनी श्कोर टीमश् तैयार करने का सुनहरा मौका है, जिसमें युवा और ऊर्जावान चेहरों को प्रशासनिक अनुभव मिल सके।
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