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77वां गणतंत्र दिवसः कर्तव्य पथ पर राष्ट्रपति ने फहराया ध्वज : साक्षी बने विदेशी मेहमान, परेड में देखने को मिला सेना का शौर्य और अनदेशी ताकत

साक्षी बने विदेशी मेहमान, परेड में देखने को मिला सेना का शौर्य और अनदेशी ताकत
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admin

Jan 26, 202612:58 PM

नई दिल्ली। आज 26 जनवरी को देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। कर्तव्य पथ पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्र ध्वज फहराया और परेड की सलामी ली। समारोह की मुख्य अतिथि यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन हैं। परेड के दौरान के सेना ने अपने शौर्य का भी प्रदर्शन किया। ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल हुई इंटीग्रेटेड कमांड ने प्रदर्शन किया। सुखोई-राफेल समेत 29 एयरक्राफ्ट्स शामिल हुए। पैराट्रूपर्स उतरे। सूर्यास्त्र, एमआई-17 हेलिकॉप्टर्स ने बरसाए फूल।

परेड के दौरान कर्तव्य पथ पर 30 झांकियां निकाली गईं। यह स्वतंत्रता का मंत्र-वंदे मातरम। समृद्धि का मंत्र-आत्मनिर्भर भारत थीम पर आधारित थीं। खास बात यह रही की परेड के दौरान एक दुर्लभ नजारा देखने को तब मिला जब जब भारतीय सेना की रिमाउंट एंड वेटरनरी कोर (आरवीसी) की एक विशेष रूप से तैयार की गई पशु टुकड़ी ने कर्तव्य पथ पर मार्च किया। सेना ने देश की सबसे महत्वपूर्ण सीमाओं की रक्षा में पशुओं की अपरिहार्य भूमिका को रेखांकित किया।

परेड में पहली बार पशुओं ने किया मार्च

यह पहली बार है कि राष्ट्रीय परेड के दौरान पशुओं ने मार्च किया, जिसने सैन्य तैयारियों के एक कम दिखने वाले, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष की ओर लोगों का ध्यान खींचा। इस विशेष दल में दो बैक्ट्रियन ऊंट, चार जांस्कर टट्टू, चार प्रशिक्षित शिकारी पक्षी (रैप्टर्स), दस स्वदेशी नस्ल के आर्मी डॉग और वर्तमान में सेवा में तैनात छह पारंपरिक सैन्य कुत्ते शामिल थे।

सबसे आगे चल रहे थे बैक्ट्रियन ऊंट

सबसे आगे थे मजबूत बैक्ट्रियन ऊंट, जिन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान में ऑपरेशनों में सहायता के लिए शामिल किया गया था। अत्यधिक ठंड, कम ऑक्सीजन स्तर और 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल, ये ऊंट न्यूनतम पानी और भोजन के साथ लंबी दूरी तय करते हुए 250 किलोग्राम तक का भार ले जा सकते हैं। उनके शामिल होने से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर विशेष रूप से रेतीले इलाकों और खड़ी ढलानों में सैन्य सहायता और गश्त क्षमताएं काफी मजबूत हुई हैं। उनके साथ जांस्कर टट्टू मार्च कर रहे थे, जो लद्दाख की एक दुर्लभ देशी पहाड़ी नस्ल है।

शहनशक्ति के लिए जाने जाते हैं टट्टू

छोटे आकार के बावजूद ये टट्टू उल्लेखनीय सहनशक्ति के लिए जाने जाते हैं, जो 15,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर और शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस तक नीचे जाने वाले तापमान में 40 से 60 किलोग्राम के बीच का भार लंबी दूरी तक ले जा जा सकते हैं। ये 2020 में शामिल किए गए, तब से उन्हें सियाचिन ग्लेशियर सहित कुछ सबसे कठिन परिचालन क्षेत्रों में तैनात किया गया है। पक्षियों के हमले की रोकथाम और निगरानी के लिए सेना द्वारा तैनात किए गए चार रैप्टर्स ने फॉर्मेशन की परिचालन बढ़त को बढ़ाया।

आतंकियों की काली करतूतों का पता लगानें में सेना की मदद करते हैं कुत्ते

मेरठ के आरवीसी सेंटर और कॉलेज में रिमाउंट और पशु चिकित्सा कोर द्वारा पाले गए प्रशिक्षित किए गए ये कुत्ते आतंकवाद विरोधी अभियानों, विस्फोटक और बारूदी सुरंगों का पता लगाने, ट्रैकिंग, रखवाली, आपदा प्रतिक्रिया और खोज और बचाव अभियानों में सैनिकों की सहायता करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, सेना के कुत्तों और उनके संचालकों ने असाधारण साहस का प्रदर्शन किया है, अपनी लड़ाकू भूमिकाओं के साथ-साथ मानवीय अभियानों के लिए वीरता पुरस्कार और प्रशंसा अर्जित की है। आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया पहल के दृष्टिकोण के अनुरूप, सेना ने मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बाई और राजपलायम जैसी स्वदेशी कुत्तों की नस्लों को तेजी से शामिल किया है।

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