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लाल आतंक का THE END! : केंद्र सरकार का नक्सलवाद मुक्त भारत का लक्ष्य हुआ पूरा ?

केंद्र सरकार का नक्सलवाद मुक्त भारत का लक्ष्य हुआ पूरा ?
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admin

Mar 31, 202603:13 PM

बस्तर। 31 मार्च 2026 की तारीख जो बस्तर से नक्सलियों का अंतिम दिन गृह मंत्री अमित शाह ने घोषित किया था। इसी क्रम में पुलिस लाइन दंतेवाड़ा में पांच नक्सलियों ने बस्तर IG पी सुंदरराज, कलेक्टर देवेश ध्रुव और SP गौरव राज की मौजूदगी में आत्मसमर्पण किया, साथ ही नक्सलियों की निशानदेही पर जंगल में छुपाए हथियार ही बरामद हुए हैं, जिनमें 8 SLR, 1 कार्बाइन, 3 इंसास, 2 देशी पिस्तौल, 2 देशी कट्टा, 1 देशी रिवॉल्वर, 1 राइफल 303, 3 बंदूक 315, 5 छोटे BGL लॉन्चर, 8 बारह बोर, 5 देसी मोटार और कारतूस है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में बस्तर IG ने बस्तर को नक्सल मुक्त बताया और फोर्स की सतर्कता में कोई कमी नहीं आने की बात भी कही।

नक्सल मुक्त हुआ बस्तर क्या बोले अमित शाह

लोकसभा में नक्सलवाद पर चर्चा करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा “2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद देश के हर गरीब को घर मिला, गैस मिला, शुद्ध पीने का पानी मिला, 5 लाख तक का स्वास्थ्य का बीमा मिला, प्रति व्यक्ति, प्रतिमाह 5 किलो मुफ्त अनाज मिला... लेकिन, ये बस्तर वाले क्यों छूट गए थे?”अमित शाह ने आगे कहा कि हम एक लोकतंत्र में रहते हैं।हमने इस देश के संविधान को अपनाया है। यह ऐसी सरकार नहीं है जो किसी की धमकियों के आगे झुक जाए। यह सरकार सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। अमित शाह ने कहा कि मैं इसलिए कह रहा हूं कि सत्य को झुठलाया जा रहा है।ये बस्तर वाले इसलिए छूट गए थे, क्योंकि वहां लाल आतंक की परछाई थी, इसलिए वहां विकास नहीं पहुंचा। मोदी सरकार में आज वो परछाई हट गई है, और इसलिए आज बस्तर विकास कर रहा है। ये नरेंद्र मोदी की सरकार है, जो हथियार उठाएगा, उसका हिसाब चुकता होगा।

बड़े नक्सलियों का सरेंडर

अक्टूबर 2025 में मल्लोजुला वेणुगोपाल राव समेत 61 नक्सलियों ने सरेंडर किया था। सीपीआई माओवादी की सेंट्रल कमेटी के सदस्य देवजी के साथ मुरली उर्फ संग्राम (₹1 करोड़), दामोदर (TSC सचिव), और नरसिम्हा रेड्डी (DKSZDC सदस्य) ने आत्मसमर्पण किया। बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे हॉटस्पॉट में, हिड़मा जैसे नक्सलियों का प्रभाव था, वहां भी सरेंडर की दर बढ़ी है।ऑपरेशन ऑक्टोपस (बुढ़ा पहाड़), ऑपरेशन डबल बुल, और ऑपरेशन थंडर स्टॉर्म जैसे अभियानों के कारण कई नक्सली मुख्यधारा में लौटे हैं। पिछले 10 साल में 10,000 से ज्यादा माओवादियों ने हथियार डाल दिए हैं। अधिकारियों ने बताया कि सुरक्षा बलों के दबाव और सरकार की पुनर्वास नीतियों ने इस उग्रवाद को करारा झटका दिया है।आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में 2,300 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। वहीं, 2026 के पहले तीन महीनों में ही 630 से ज्यादा कैडरों ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया।

भारत में माओवाद का इतिहास

गृह मंत्री अमित शाह ने भारत में नक्सलवाद के इतिहास पर कहा कि 1969 में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) या सीपीआई (मार्क्सवादी), की स्थापना हुई। जिसका प्राथमिक उद्देश्य न तो राष्ट्र का विकास था और न ही नागरिकों के अधिकारों की रक्षा। इसके बजाय, पार्टी का संवैधानिक लक्ष्य चीन और रूस के उदाहरणों का अनुसरण करना औऱ सशस्त्र विद्रोह के माध्यम से संसदीय प्रणाली को उखाड़ फेंकना था। हालांकि, भारत में राजतंत्र नहीं था, बल्कि यहां लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार थी।नक्सलवाद की चिंगारी साल 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से भड़की थी।सिलीगुड़ी में सीपीआई(एम) के कट्टरपंथी धड़ों ने जमींदारों के ख़िलाफ़, कर्ज में डूबे आदिवासियों और भूमिहीन किसानों के साथ मिलकर अभियान शुरू किया था। सशस्त्र संघर्ष फैलना शुरू हुआ तो चीन की मीडिया ने इसे 'स्प्रिंग थंडर ओवर इंडिया' करार दिया। इससे दो साल पहले एक स्थानीय सीपीआई(एम) नेता चारु मजूमदार ने गुरिल्ला युद्ध के जरिए इंडियन स्टेट को उखाड़ फेंकने के मक़सद के साथ 'आठ दस्तावेज' तैयार किए थे, उन्होंने शुरुआत में नक्सलबाड़ी आंदोलन का नेतृत्व किया। यह आंदोलन बाद में श्रीकाकुलम, तेलंगाना, बिहार समेत दंडकारण्य के जंगलों तक फैल गया।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र

2014 में देश के 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर मात्र 11 रह गई थी। फरवरी 2026 को गृह मंत्रालय की एक समीक्षा बैठक के आंकड़े बताते हैं कि देश में केवल सात जिले ही वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बचे हैं। इसके अलावा 2014 में 36 जिले नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की श्रेणी में आते थे, जिनकी संख्या अब घटकर सिर्फ तीन रह गई है।

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