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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों द्वारा अपनाई गई मुफ्त की योजनाओं पर सख्त टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्यों में अपनाई गई मुफ्त सुविधाओं की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधा डालती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यों की सरकारें भारी कर्ज के दबाव और घाटे में हैं। इसके बावजूद मुफ्त की रेवड़ियां बांट रही है। इसकी बजाय रोजगार पैदा करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने की है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत समेत अन्य जजों ने सख्त टिप्पणी करते दो टूक शब्दों में कहा कि जो लोग भुगतान नहीं कर सकते, उन्हें सहायता देना समझ में आता है। लेकिन अमीर-गरीब में फर्क किए बिना सबको मुफ्त देना गलत नीति है। इस दौरान कोर्ट ने चेतावनी दी और कहा अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, साइकिल और बिजली मिलती रही तो लोगों में काम करने की भावना कम हो जाएगी।
कोर्ट का राज्यों को दी सलाह और पूछा सवाल
वहीं कोर्ट ने राज्यों को सलाह दी कि मुफ्त चीजें बांटने के बजाय, रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा, भारत में हम कैसी संस्कृति बना रहे हैं? क्या यह वोट पाने की नीति नहीं बन जाएगी? फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब अगली सुनवाई में तय होगा कि ऐसे मुफ्त बिजली योजनाओं पर क्या नियम लागू होंगे।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
यह मामला इसलिए बड़ा है क्योंकि कई राज्यों में चुनाव से पहले मुफ्त योजनाएं घोषित होती हैं और इससे सरकारी खर्च बढ़ता है, जिससे आर्थिक संतुलन बिगड़ने का खतरा रहता है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि गरीबों की मदद जरूरी है, लेकिन बिना सोच-समझ सबको मुफ्त सुविधाएं देना देश के विकास के लिए सही नहीं है।
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