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भोपाल। कैम्पस में छात्रों का उत्पीड़न रोकने के लिए लाई गई विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( यूजीसी ) की गाइडलाइन पर देश भर में मचे बवाल के बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने भले ही इसके अमल पर रोक लगा दी हो, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार अपरोक्ष रूप से इसे लागू करने पर आमादा है। विवाद की जड़ में उत्पीडन का शिकार होने वाले छात्रों की श्रेणियां रही हैं, जिनमें सामान्य वर्ग को शामिल नहीं किया गया था। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट का स्टे भी आया। लेकिन लगता है प्रदेश की अफसरशाही को इससे कोई वास्ता नहीं। अदालत के आदेश के तीन दिन बाद ही प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग ने जो दिशा निर्देश जारी किये हैं उनमें भी कैंपस में पीड़ित होने वाले छात्रों को सिर्फ आरक्षित वर्ग तक ही सीमित रखा गया है। सरकार के इस कदम से सवर्ण समाज में आंदोलन की दबी चिंगारी को फिर हवा मिलने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी की गाइडलाइन लागू करने पर रोक लगा दी थी। सर्वोच्च अदालत ने माना था कि उत्पीडन के शिकार होने वाले छात्रों में सामान्य वर्ग को शामिल न करना और यह मानना की ऐसी सिर्फ आरक्षित वर्ग के साथ ही होगा, उचित नहीं है। इससे भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा। यह समाज को बांटने वाला है और इसका दुरूपयोग हो सकता है। इसके बाद अलग -अलग राज्यों में चल रहे आंदोलन थम गए थे। लेकिन तीन दिन बाद यानी 2 फरवरी को प्रदेश का उच्च शिक्षा विभाग प्रदेश की सभी यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार और कॉलेजों के प्राचार्य को एक विस्तृत सर्कुलर भेजता है।
उच्च शिक्षा विभाग के अवर सचिव वीरन सिंह भलावी के हस्ताक्षर से जारी इस सर्कुलर में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2023 के नियमों का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से लोकपाल और विद्यार्थी शिकायत निवारण समिति का गठन किया जाना है। ये समितियां 15 दिनों के भीतर शिकायतों का निराकरण कर संस्था प्रमुख को भेजेंगी। इससे असंतुष्ट होने पर छात्र लोकपाल को अपील करेंगे जहाँ से 30 दिनों के भीतर निराकरण होगा। ख़ास बात यह है कि शिकायत निवारण समितियों में एक सदस्य अनिवार्य रूप से एससी -एसटी - ओबीसी का रखे जाने का प्रावधान है। सामान्य वर्ग के सदस्य की कोई अनिवार्यता नहीं है।
आपत्ति वाले प्रावधान जस के तस
सर्कुलर में छात्रों की शिकायतों में एडमिशन से लेकर सिलेबस, पढाई के स्तर को शामिल किया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की मंशा के विपरीत जातिगत भेदभाव यहां मौजूद है। इसके तहत यह मानकर चला जा रहा है कि भेदभाव केवल आरक्षित वर्ग के साथ ही हो सकता है, सामान्य वर्ग के साथ नहीं। सर्कुलर के बिंदु 7 की कंडिका कहती है- श्अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक अथवा दिव्यांग श्रेणियों के विद्यार्थियों से कथित भेदभाव की शिकायत।्य आगे कहा गया है कि लोकपाल का फैसला आने के बाद संस्थान के साथ ही पीड़ित छात्र को भी उसके आदेश की प्रति उपलब्ध कराई जाएगी।
जहां शिकायत झूठी पाई जाएगी वहां लोकपाल शिकायतकर्ता के विरुद्ध उपयुक्त कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रदेश की नौकरशाही इस बात से अनजान है कि इस संवेदनशील मामले को लेकर देश भर में बवाल हो चुका है और सुप्रीम कोर्ट स्थगन आदेश दे चुका है। जाहिर है अफसर इससे अनजान तो नहीं होंगे। फिर , यह इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि किस तरह फाइलें चलती हैं और उन पर हस्ताक्षर होते हैं। अगर सतर्कता दिखाई जाती तो पहले से जारी इस गाइड लाइन से जातियों वाला बिंदु हटाया जा सकता था। सवाल यह भी कि ऐसे दिशा निर्देशों की वजह से यदि कोई अप्रिय घटना घटती है तो फिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी।
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