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जयपुर। होली का नाम सुनते ही रंग, उमंग और भाईचारे की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है, लेकिन गुलाबी नगरी जयपुर की होली कुछ खास पहचान रखती है। यहां सिर्फ गुलाल नहीं उड़ता, बल्कि सदियों पुरानी एक ऐसी परंपरा जीवंत होती है, जो हिंदू त्योहार और मुस्लिम कारीगरी के अद्भुत संगम की मिसाल है। यह परंपरा है ‘गुलाल गोटे’ की, जो इतिहास, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द के रंगों से सराबोर है।
गुलाल गोटा दिखने में छोटी सी गेंद जैसा होता है, जिसका वजन लगभग 4 से 6 ग्राम के बीच रहता है। इसे लाख से तैयार किया जाता है और यह इतनी नाजुक होती है कि किसी के शरीर से हल्के से टकराते ही फूट जाती है। जैसे ही यह टूटती है, इसके भीतर भरा खुशबूदार गुलाल सामने वाले को रंगों में रंग देता है। खास बात यह है कि इससे किसी को चोट नहीं लगती, इसलिए यह पारंपरिक और सुरक्षित दोनों माना जाता है।
इस अनोखी कला की जड़ें वर्ष 1727 में जुड़ी मानी जाती हैं, सवाई जय सिंह द्वितीय ने जयपुर शहर की स्थापना की थी। उसी समय से मनिहार समुदाय के कारीगर इस शिल्प में दक्ष रहे हैं। जयपुर के प्रसिद्ध ‘मनिहारों का रास्ता’ क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिम मनिहार परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को संजोए हुए हैं। आज उनकी सातवीं और आठवीं पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है। यह परंपरा केवल एक शिल्प नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत मिसाल है।
गुलाल गोटा बनाने की प्रक्रिया बेहद सावधानी और कुशलता मांगती है। सबसे पहले लाख को गर्म कर पिघलाया जाता है। इसके बाद कांच की पतली नली या फूंकनी की सहायता से उसमें हवा भरकर गोल आकार दिया जाता है। यह काम बेहद नाजुक होता है, क्योंकि जरा सी गलती पूरी संरचना को खराब कर सकती है। जब गोला तैयार हो जाता है, तो उसके भीतर सुगंधित और प्राकृतिक गुलाल भरा जाता है। अंत में इसे कागज या अरारोट के लेप से सावधानीपूर्वक बंद किया जाता है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि शुरुआती दौर में गुलाल गोटे विशेष रूप से राजघराने के लिए बनाए जाते थे। होली के अवसर पर राजा हाथी पर सवार होकर प्रजा के बीच आते और गुलाल गोटे फेंककर उत्सव का आनंद लेते थे। समय के साथ राजशाही का स्वरूप बदला, लेकिन यह परंपरा आज भी कायम है। वर्तमान में भी जयपुर के सिटी प्लेस जयपुर में होली के मौके पर गुलाल गोटों की विशेष मांग रहती है।
पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी गुलाल गोटे महत्वपूर्ण हैं। ये पूरी तरह ईको-फ्रेंडली होते हैं, क्योंकि इन्हें शुद्ध लाख और प्राकृतिक रंगों से तैयार किया जाता है। प्लास्टिक या रासायनिक रंगों के विपरीत ये प्रकृति और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित माने जाते हैं।
गुलाल गोटे सिर्फ एक पारंपरिक खिलौना नहीं, बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक पहचान, साझा विरासत और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक हैं। होली के रंगों में घुली यह परंपरा आज भी बताती है कि असली उत्सव वही है, जिसमें इतिहास, कला और भाईचारा साथ-साथ खिलते हैं।
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