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गणेश साकल्ले
लंबे अरसे से विपक्ष में रहने के बावजूद कबीलों में बंटी कांग्रेस बुरे वक्त में भी एकजुट नहीं हो पा रही है। इसके पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वालों की सख्ंया कम नहीं है। ताजा मामला विधानसभा में प्रतिपक्ष के उप नेता पद से हेमंत कटारे के इस्तीफे का है। उन्होंने अपने इस्तीफे की टाइमिंग कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आगमन के ठीक चार दिन पहले की चुनी है। अब सवाल यह उठता है कि हेमंत अचानक नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार से खफा हो गए या राष्ट्रीय नेतृत्व का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया है। उनके इस कदम को कांग्रेस में ब्राम्हण नेताओं को दरकिनार किए जाने से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
ब्राम्हण कार्ड के तहत ही हेमंत के पिता स्व. सत्यदेव कटारे नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी तक पहुंचे थे। कमोवेश ऐसा ही कुछ हेमंत के मन मस्तिष्क में भी कौंधा होगा। मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस बीते दो वर्ष से विपक्ष में है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी तभी से काबिज हैं। फिर अचानक ऐसा क्या घट गया कि हेमंत आहत हो गए और उन्होंने इस्तीफा देने तक का फैसला ले लिया।
समझा जाता है कि कटारे ने यह कदम सोची समझी रणनीति के तहत उठाया है। राष्ट्रीय नेतृत्व के समक्ष शायद यह जताने की कोशिश की जा रही है कि कांग्रेस में ब्राम्हण नेताओं की वैसे ही कमी है। दूसरी तरफ उन जैसे युवा ब्राम्हण नेता को पार्टी में तवज्जो नहीं मिल रही है। बहरहाल हेमंत पिछले कई दिनों से सदन में भी खिंचे-खिंचे नजर आ रहे थे। डिप्टी चीफ मिनिस्टर जगदीश देवड़ा ने जिस मप्र का बजट पेश किया, उस दिन भी जब उमंग सिंघार के कहने पर कई युवा विधायक आगे आकर नारेबाजी कर रहे थे, तब हेमंत कुछ देर के लिए आगे तो गए, लेकिन बाद में लौटकर अपने स्थान पर आ गए। ऐसा करने वाले हेमंत अकेले नहीं थे और भी कई कांग्रेस विधायक विपक्ष की एकजुटता नहीं दिखा रहे थे। कुछ वरिष्ठ विधायक तो अपनी सीट से ही नहीं उठे।
ऐसे नजारे सदन में आए दिन देखने को मिलते हैं। इससे जाहिर है कि विपक्ष में किस कदर फूट है। पार्टी में बहुत से विधायक ऐसे हैं, जो नेता प्रतिपक्ष पद पर उमंग सिंघार की मौजूदगी को पचा नहीं पा रहे हैं। आदिवासी नेता होने के कारण कोई खुलकर तो कुछ नहीं बोल पा रहा है, लेकिन कई कद्दावर नेताओं की निगाह नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर टिकी हुई है। इनमें से एक हेमंत कटारे भी हैं। अब देखना है कि राष्ट्रीय नेतृत्व हेमंत की इस हरकत को किस रूप में लेता है। उन्हें तवज्जो देता है या इस्तीफा स्वीकार किसी अन्य युवा नेता को उप नेता का दायित्व सौंपता है।
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