Latest News

रायसेन। मध्यप्रदेश के रायसेन में रमजान के दौरान परंपरागत रूप से तोप चलाने की अनुमति दिए जाने के मामले ने अब बड़ा प्रशासनिक और कानूनी विवाद खड़ा कर दिया है। जिला प्रशासन द्वारा रोजा इफ्तार और सहरई के समय संकेत देने के लिए किले से तोप चलाने की अनुमति दिए जाने पर सवाल उठने लगे हैं। मामला तब और तूल पकड़ गया जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने निरीक्षण के बाद स्पष्ट कहा कि कलेटर को इस तरह की तोप चलाने की अनुमति देने का अधिकार ही नहीं है।
रमजान में संकेत के लिए दी गई थी अनुमति
जिला प्रशासन ने मुस्लिम त्योहार कमेटी रायसेन को रमजान माह के दौरान रोजा इफ्तार और सहरई के समय संकेत देने के लिए पारंपरिक तोप चलाने की सशर्त अनुमति दी थी। कमेटी के सचिव सलमान उल्लाह हाशमी ने प्रशासन को आवेदन देकर बताया था कि वर्षों से शाम करीब 6ः30 बजे इफ्तार और रात लगभग 3ः30 बजे सहरई के समय तोप चलाकर लोगों को संकेत देने की परंपरा चली आ रही है। इसी परंपरा को निभाने के लिए जिला शस्त्रागार में सुरक्षित रखी तोप उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था।
पुलिस रिपोर्ट के बाद प्रशासन ने दी मंजूरी
प्रशासन ने इस आवेदन पर कार्रवाई करते हुए पुलिस अधीक्षक से प्रतिवेदन मांगा था। एसडीओपी रायसेन और कोतवाली थाना प्रभारी से प्राप्त अभिमत के आधार पर पुलिस ने कुछ शर्तों के साथ तोप उपलब्ध कराने की अनुशंसा की थी। इसके बाद कलेटर एवं जिला दण्डाधिकारी द्वारा आदेश जारी कर रमजान अवधि तक सीमित अनुमति प्रदान कर दी गई।
आदेश में यह भी कहा
गया कि तोप का संचालन शासन के दिशानिर्देशों के अनुरूप किया जाएगा और सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी मुस्लिम त्योहार कमेटी की होगी। किले से संचालन, कई विभागों की अनुमति जरूरी प्रशासनिक आदेश के अनुसार यह तोप रायसेन किले से चलाई जानी थी। किला पुरातत्व विभाग के अधीन होने के कारण उससे अनुमति लेना अनिवार्य बताया गया था। साथ ही तोप केवल निर्धारित समय पर ही चलाने की शर्त रखी गई थी। तोप संचालन के लिए वार्ड क्रमांक 6 टेका मोहल्ला निवासी सखावत उल्ला को नियुत किया गया था, जिन्हें पिछले लगभग 20 वर्षों से रमजान के दौरान तोप चलाने का अनुभव बताया गया है। रमजान समाप्त होते ही तोप को जिला शस्त्रागार में वापस जमा कराने का निर्देश भी दिया गया था।
पुरातत्व और वन विभाग की अनुमति भी सवालों में
निरीक्षण के दौरान कानूनगो ने पुरातत्व विभाग से अनापाि प्रमाण पत्र की प्रति भी मांगी, लेकिन मौके पर कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका। उन्होंने कहा कि रायसेन किला वन क्षेत्र के करीब स्थित है और यह टाइगर मूवमेंट वाला इलाका भी माना जाता है। ऐसे में किसी भी विस्फोटक गतिविधि के लिए वन विभाग और पुरातत्व विभाग दोनों की अनुमति आवश्यक होती है।
प्रशासन से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पूरे मामले में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। जांच में यह देखा जाएगा कि अनुमति प्रक्रिया में कौन-कौन से नियमों का पालन हुआ और किन स्तरों पर चूक हुई। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर कलेटर ने तोप चलाने की अनुमति किस वैधानिक आधार पर दी, जबकि भारी हथियारों से जुड़े लाइसेंस उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। इसी मुद्दे पर अब जिला प्रशासन पूरी तरह घिरता नजर आ रहा है।
मानवाधिकार आयोग के सदस्य ने किया निरीक्षण
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो गुरुवार को रायसेन पहुंचे। उन्होंने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ किले पर जाकर उस स्थान का निरीक्षण किया, जहां से तोप चलाई जा रही थी। निरीक्षण के दौरान आवश्यक दस्तावेज और वैध अनुमति उपलब्ध नहीं होने पर उन्होंने कड़ी नाराजगी जताई और तत्काल प्रभाव से किले से तोप चलाने की गतिविधि बंद करने के निर्देश दिए।
वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला तब चर्चा में आया जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें रायसेन किले की प्राचीर से देसी तोप चलाते हुए कुछ युवक दिखाई दिए। वीडियो में नारेबाजी और रील बनाए जाने की बात भी सामने आई। बताया जा रहा है कि वीडियो में ईरान के समर्थन में नारे लगाए जाने के आरोप भी लगाए गए, जिसके बाद यह मुद्दा प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद में बदल गया।
Advertisement
