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नई दिल्ली। लोकसभा में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) में संशोधन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक को हरी झंडी मिल गई है। जिसका उद्देश्य दिवालियापन से जुड़े मामलों के समाधान को तेज और अधिक प्रभावी बनाना है। इस संशोधन के तहत, किसी कंपनी के डिफॉल्ट साबित होने के बाद दिवालियापन आवेदन को स्वीकार करने के लिए 14 दिनों की अनिवार्य समय सीमा तय की गई है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ने सदन में विधेयक पेश करते हुए बताया कि सरकार ने इसमें 12 अहम संशोधन प्रस्तावित किए हैं। उनका कहना था कि आईबीसी प्रक्रिया में देरी की सबसे बड़ी वजह अत्यधिक मुकदमेबाजी है, जिसे कम करने के लिए नए प्रावधान जोड़े गए हैं। साथ ही, प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए दंडात्मक प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
चयन समिति को भेजा गया था विधेयक
यह विधेयक पहले एक चयन समिति को भेजा गया था, जिसने इसमें सुधार के सुझाव दिए। 27 मार्च को इस पर विस्तृत चर्चा के बाद इसे पारित कर दिया गया। सरकार का मानना है कि इन बदलावों से कंपनियों और व्यक्तियों के दिवालियापन मामलों के निपटान में हो रही देरी को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। वित्त मंत्री ने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता, जो 2016 में लागू हुआ था, ने देश के बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके जरिए न केवल ऋण अनुशासन में सुधार हुआ है, बल्कि कंपनियों की क्रेडिट प्रोफाइल भी बेहतर हुई है।
नए संशोधनों से आईबीसी ढांचे को मिलेगी मजबूती
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आईबीसी का उद्देश्य कभी भी केवल ऋण वसूली का माध्यम बनना नहीं था, बल्कि इसका मकसद संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करना और उनके मूल्य को संरक्षित करना है। सीतारमण के अनुसार, इस प्रक्रिया से बाहर आने वाली कंपनियों के प्रदर्शन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। सरकार को उम्मीद है कि नए संशोधनों से आईबीसी ढांचे को और मजबूती मिलेगी और आर्थिक प्रणाली में पारदर्शिता व दक्षता बढ़ेगी।
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