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मालिनी अवस्थी ठहरीं मालिनी अवस्थी : अविस्मरणीय घटना ने लोक संगीत और रंगमंच की सच्ची शक्ति को किया उजागर

अविस्मरणीय घटना ने लोक संगीत और रंगमंच की सच्ची शक्ति को किया उजागर
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admin

Feb 09, 202612:31 PM

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में आयोजित भारतीय रंग महोत्सव (भारत रंग महोत्सव) के दौरान रविवार की शाम एक अविस्मरणीय घटना घटी। इस घटना ने लोक संगीत और रंगमंच की सच्ची शक्ति को उजागर कर दिया। पद्मश्री सम्मानित लोक गायिका मालिनी अवस्थी की प्रस्तुति निर्धारित थी, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण मंच पर न लाइटें जलीं और न ही माइक्रोफोन काम कर रहे थे। अधिकारियों ने सुझाव दिया कि कार्यक्रम किसी अन्य दिन के लिए स्थगित कर दिया जाए, लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने मंच की ऊंचाई को ठुकराकर श्रोताओं के बीच उतरना चुना और एक ऐसी प्रस्तुति दी जो तकनीक से परे, दिल से दिल तक पहुंच गई।

घटना की शुरुआत में पूरा सभागार अंधेरे में डूबा हुआ था। माइक खामोश थे, स्पॉटलाइट्स थम चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे रंगमंच की सांस रुक गई हो। लेकिन ठीक उसी पल लोक की आत्मा जाग उठी। मालिनी अवस्थी मंच पर नहीं चढ़ीं, बल्कि सीढियों पर बैठ गईं-ठीक वैसे जैसे कोई गाँव की चैपाल में अपनी कथा सुना रही हो। उनके पास न कोई वाद्य यंत्र का सहारा था न प्रकाश का, बस उनका कंठ था, मन था और मिट्टी से उपजा स्वर। श्रोता भी अपनी कुर्सियां छोड़कर आसपास जमीन पर बैठ गए, जैसे कोई अनौपचारिक लोक-संगोष्ठी चल रही हो।

हर तान में महसूस हुई खेतों की हवा

फिर जो गान बहा, वह महज संगीत नहीं था-वह संस्कार था, स्मृति थी, जीवन की धड़कन थी। हर तान में खेतों की हवा महसूस हुई, हर बोल में लोक की पुरानी यादें जीवंत हो उठीं। अवधी, भोजपुरी और बुंदेली बोलियों में गाए गए उनके गीत-कजरी, सोहर, झूला या ठुमरी-सीधे हृदय में उतरते चले गए। बिना किसी शोर-शराबे, बिना दिखावे के, उनकी आवाज ने पूरे सभागार को एक सूत्र में बांध दिया। अंधेरे में भी चेहरों पर मुस्कान फैल गई, आंखें नम हो गईं। वह पल साबित कर गया कि सच्चा कलाकार मंच पर निर्भर नहीं होता, वह जन-जन से जुड़ता है।

गहरा संदेश दे गई घटना

इस घटना ने एक गहरा संदेश दिया-लोक कलाकार मंच से नहीं, जन से बड़ा होता है। सुविधाएं छिन जाएं तो भी जिसका सुर न डगमगाए, जिसकी साधना न रुके, वही महान होता है। मालिनी अवस्थी ने यह जता दिया कि लोक की शक्ति रोशनी और ध्वनि में नहीं, बल्कि संवेदना, सादगी और सच्चे सरोकार में बसती है। यह प्रस्तुति तकनीकी असफलता नहीं, बल्कि रंगमंच की जीत थी-जहां कला ने तकनीक को मात दे दी। एनएसडी के इस महोत्सव में यह क्षण अमर हो गया, जो याद दिलाता है कि असली प्रदर्शन दिल की गहराइयों से निकलता है, न कि उपकरणों से। उनकी इस सादगी भरी प्रस्तुति ने भारतीय लोक संगीत और रंगमंच की आत्मा को नई ऊर्जा प्रदान की।

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