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भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र का आज पांचवां दिन हंगामेदार रहा। सदन में इंदौर के भागीरथपुरा कांड को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि घटना सामने आते ही सरकार ने त्वरित कार्रवाई की। पीड़ितों के इलाज की व्यवस्था की गई, पानी की जांच कराई गई और नई पाइपलाइन डालने का काम शुरू कर दिया गया है। साथ ही लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है। वही बहस के दौरान कांग्रेस विधायक जयवर्धन ने सवाल किया सरकार ने गंदे पानी से 20 मौत बताया, लिस्ट में 32 मौतें, सही आंकड़ा क्या है?
मंत्री ने कहा कि भागीरथपुरा लगभग 90 साल पुरानी बस्ती है, जो मुंबई की धारावी का छोटा स्वरूप है। यहां काम करना नगर निगम कर्मचारियों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि नागरिकों ने पहले शिकायत की थी और इस मामले में देरी हुई। महापौर द्वारा टेंडर जारी किए गए थे, लेकिन काम समय पर शुरू नहीं हो पाया। जांच के लिए गठित कमेटी में कुछ अधिकारी दोषी पाए गए, जिन पर कार्रवाई की गई है। उन्होंने इसे इंदौर के लिए कलंक बताया और कहा कि स्वच्छता में लगातार नंबर एक रहने वाले शहर की छवि को इससे ठेस पहुंची है।
विपक्ष की ओर से नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि लोगों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार जवाब देने से बच रही है। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि काला पानी की सजा तो सुनी थी, लेकिन यहां लोगों को काला पानी पिलाया जा रहा है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सदन में विस्तृत चर्चा की मांग की।
नैतिकता से जुड़ा है यह मामलाः जयवर्धन सिंह
जयवर्धन सिंह ने कहा कि यह मामला नैतिकता से जुड़ा है। जब भी किसी पुरस्कार की बात होती है तो नेता सामने आ जाते हैं, लेकिन जब जिम्मेदारी तय करने की बात आती है तो अधिकारियों को आगे कर दिया जाता है और मंत्री या महापौर पीछे हट जाते हैं। उन्होंने कहा कि स्थगन को स्वीकार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज ही उन्होंने मंत्री से पूछा था कि भागीरथपुरा प्रकरण में अब तक कितनी मौतें हुई हैं। जवाब के पहले पेज पर 20 का आंकड़ा दिया गया है, जबकि परिशिष्ट में 32 मौतें दर्ज हैं। उन्होंने कहा कि 6 फरवरी 2026 तक 32 मौतों का उल्लेख उसी उत्तर के परिशिष्ट में है। ऐसे में प्रमुख पेज पर 20 का आंकड़ा देना त्रुटिपूर्ण है और इस पर चर्चा होनी चाहिए कि सही आंकड़ा क्यों नहीं दिया जा रहा।
उन्होंने कहा कि अब तक सिर्फ 20 लोगों को मुआवजा मिला है। बाकी मृतकों के परिजनों को सहायता कब दी जाएगी? मुख्यमंत्री ने 4 लाख रुपए की सहायता की घोषणा की थी, वह कब तक मिलेगी? इन सभी बातों की तारीख तय होनी चाहिए और इस पर चर्चा होनी चाहिए।
जयवर्धन सिंह ने कहा कि मंत्री ने स्वयं बताया कि वे 15 महीने तक इस विभाग के मंत्री रहे हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि अमृत योजना के माध्यम से नल-जल और पेयजल योजनाओं पर बड़ी राशि खर्च की गई। उन्होंने कहा कि सवाल यह नहीं है कि हादसे के बाद क्या किया जाएगा, बल्कि यह है कि हादसे से पहले क्या चूक हुई।
उन्होंने कहा कि 2014 से 2026 के बीच अमृत योजना के तहत इंदौर में सीवेज और मल निष्पादन पर लगभग 2000 करोड़ रुपए खर्च किए गए। उन्होंने दावा किया कि भागीरथपुरा हादसे में नर्मदा पाइपलाइन में सीवेज का पानी घुसा। उन्होंने कहा कि इंदौर नगर निगम का वार्षिक जल आपूर्ति और पाइपलाइन बजट करीब 1000 करोड़ रुपए है, जो प्रदेश के सबसे संपन्न नगर निगमों में से एक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अमृत योजना के माध्यम से जो खर्च हुआ, उसकी जांच होनी चाहिए। यह केवल इंदौर नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश का मामला है। पिछले 10 वर्षों में सीवेज के जो काम हुए हैं, उनकी भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भागीरथपुरा के पास एक पोस्टर लगा था, जिस पर लिखा थाकृ“प्रत्येक घर पहुंचाएगा स्वच्छ जल, जब खिलेगा कमल।” लेकिन न तो स्वच्छ जल पहुंच पाया और कई नल सूख गए।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा ने कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए स्थगन प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। प्रश्नकाल के दौरान माहौल कुछ हल्का भी रहा। विधायक भंवर सिंह शेखावत की टिप्पणी पर मंत्री विजयवर्गीय ने होली के त्योहार का हवाला देते हुए सौहार्द बनाए रखने की बात कही। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने भी हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की, जिस पर सदन में ठहाके लगे।
प्रश्नकाल में विधायक अजय बिश्नोई ने नगर निकायों के लिए सस्ती बिजली योजना का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि भोपाल नगर निगम ने 10 मेगावाट बिजली के लिए निजी कंपनी से समझौता किया है, जिसके तहत 35 वर्षों तक 3 से 3.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली मिलेगी। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि छोटी नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के लिए संयुक्त टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि उन्हें भी सस्ती बिजली मिल सके। इसके अलावा सदस्यों ने बैराज निर्माण, भर्ती गड़बड़ी, किसानों की फसल नुकसान और विकास कार्यों की गुणवत्ता जैसे मुद्दे भी उठाए।
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